चुनाव का बिगुल (वर्ष-6, अंक 11)
Oct 31st, 2008 by admin
चाहे हो मल्होत्रा या शीला सरकार
जनता अब है नहीं नेताओं को प्यार
नेताओं को प्यार चुनावी बिगुल बजा है
टिकट बांटने नेता का दरबार सजा है
कह चेतन कविराय टिकट की महिमा न्यारी
नेता जी की जीत सदा जनता तो हारी