साजिश का शिकार शेखावत (अंक 49)
Jul 16th, 2007 by admin
नई दिल्ली। उप-राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के झंडे तले निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति का चुनाव अपनी मर्जी से लड़ रहे हैं या फिर उन्हें भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से बलि का बकरा बनाया जा रहा है? यह सवाल इसलिए उठना स्वभाविक है क्योंकि भैरो सिंह शेखावत जैसा राजनीति का अनुभवी व शातिर खिलाड़ी भी यह जानता है कि इस चुनाव में उनकी पराजय निश्चित है और उन्होंने जीवन में पराजय को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया है।
राजनीति में 60 साल का अनुभव रखने वाले भैरों सिंह जानते बूझते भी आसानी से हारने के लिए चुनाव लड़ने के लिए राजी हो जाएंगे, यह बात किसी के भी गले आसानी से उतरती नहीं है। खासकर यह देखते हुए कि संयुख्त प्रगतिशील गठबंधन और वाममोर्चा समर्थित प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटों के गणित में उनसे बहुत आगे हैं। 10.98लाख वोटों के निर्वाचन मंडल में से केवल 35 फीसदी वोटों पर ही भैरो सिंह अपनी दावेदारी जता सकते हैं। इतना ही नहीं अपने व्यतिगत संबंध और साफ सुथरी छवि के बल पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में बगावत पैदा करने का ख्वाब देखने वाले श्री शेखावत को भाजपा की सहयोगी शिव सेना द्वारा प्रतिभा पाटिल का समर्थन करने से गहरा झटका लगा है। बावजूद इसके वह चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। इससे ऐसा ही लगता है कि पर्दे के पीछे से कोई शक्ति उन पर चुनाव लड़ने के लिए जोर डाल रही है।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस के भीतर राष्ट्रपति पद के लिए कई उम्मीदवार होने और उनके नामों पर वाम मोर्चा के विरोध को देखते हुए शुरु में भैरो सिंह शेखावत का चुनाव लड़ने का फैसला सही था क्योंकि उस वक्त की परिस्थितियों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में फूट साफ नजर आ रही थी। जिसे देखते हुए श्री शेखावत का क्रोस वोटिंग होने की उम्मीदें बांधना गलत नहीं था। मगर उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस की ओर से प्रतिभा पाटिल को आगे करने और वाम मोर्चा के उनका पुरजोर समर्थन करने से श्री शेखावत की तमाम उम्मीदों पर पानी फिर गया है। ऐसे में बेहतर तो यही होता कि वह राष्ट्रपति पद के चुनाव से अपना नाम वापिस ले लेते। इससे उनका सम्मान भी बचा रहता है।
ऐसा नहीं है कि भैरो सिंह शेखावत इस चुनावी गणित से अनजान हैं या वह यह नहीं जानते कि इस पराजय के बाद लोग उन्हें किस रूप में याद रखेंगे या उनके शानदार करियर का कैसा अंत होगा? मूल सवाल फिर यही है कि वह सब जानते बूझते चुनाव क्यों लड़ रहे हैं। खासकर यह देखते हुए कि जैसे-जैसे चुनाव का दिन नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में प्रतिद्वंदी उममीदवार के चरित्र पर कीचड़ उछालकर उसे दागदार साबित करने के प्रयास भी तेज कर दिए हैं। जिसकी वजह से इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में निम्न स्तरीय आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। यह स्थिति भी राजनीति में मूल्यों के पक्षधर श्री शेखावत के अनुकूल नहीं कही जा सकती। क्योंकि अपनी शालीनता व विनम्र स्वभाव के कारण ही उन्होंने विभिन्न दलों में अपने मित्र बनाए हैं। फिर वह क्या कारण है कि वह भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रतिभा पाटिल के खिलाफ चलाए जा रहे चरित्र हनन के अभियान का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। जबकि इसकी वजह से उनकी छवि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। क्योंकि समय बीतने के साथ-साथ लोगों को यह महसूस होने लगा है कि उम्र के इस पड़ाव पर आ कर भैरों सिंह सर्वोच्च संवैधानिक पद के शिखर तक पहुंचने के लिए कोई भी रास्ता आख्तियार कर सकते हैं। जबकि यह हकीकत नहीं है। उन्होंने तो जिंदगी भर अपने सिद्घांतों से समझौता नहीं किया है, फिर असली वजह क्या है?
इन सभी सवालों का एक ही जवाब है कि न चाहते हुए अनुशासन की डोर से बंधे होने के कारण भैरो सिंह शेखावत भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक कलह के कारण बलि का बकरा बनने को राजी हो गए हैं।
भारतीय जनता पार्टी के भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार सन 2009 में होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर पार्टी के कुछ नेताओं ने शेखावत को सर्वोच्च पद की होड़ से बाहर रखने की जो रणनीति तैयार की है, उसके तहत ही उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए मजबूर किया गया है। इन सूत्रों की मानें तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़ने और दुबारा से प्रधानमंत्री बनने के प्रति अनिच्छा से सबको पहले ही अवगत करा चुके हैं। ऐसे में लाल कृष्ण आडवाणी ही इस पद के लिए पार्टी के एक मात्र दावेदार बचते थे। मगर उनकी राह में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नाराजगी और कट्टपंथी छवि होने के कारण दूसरे दलों का समर्थन न मिल पाने की वजह से अड़चन आ सकती थी। इसके विपरीत भैरो सिंह शेखावत न केवल संघ परिवार की पसंद के तौर पर बल्कि अन्य दलों के साथ बेहतर संबंध रखने के कारण भी पार्टी के सर्वग्राही नेता के तौर पर उभर सकते थे। इसे देखते हुए ही आडवाणी व उनके समर्थकों ने भैरो सिंह शेखावत को राष्ट्रपति के चुनाव मैदान में डटे रहने के लिए मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं आडवाणी के खासमखास अरुण जेटली व सुषमा स्वराज ने भी श्री शेखावत के चुनाव प्रचार की कमान संभालने के साथ ही उनकी प्रतिद्वंदी प्रतिभा पाटिल को दागदार साबित करने के लिए गड़े मुद्दे उखाड़ कर अरोपों की झड़ी लगा दी। ऐसा भी एक सोची समझी रणनीति के तहत ही किया गया है। क्योंकि अरुण जेटली व सुषमा स्वराज यह अच्छी तरह जानते हैं कि अपनी उम्मीदवार के बचाव में कांग्रेस भी भैरो सिंह के अतीत से जुड़े ऐसे मुद्दे ढूंढ निकालेगी जिनके बल पर उनके चरित्र पर उंगलियां उठाई जा सकें और हुआ भी ऐसा ही। आने वाले दिनों में कांग्रेस ने भैरो सिंह के खिलाफ और भी आक्रामक रवैया अख्तियार करने का फैसला किया है। इससे अरुण जेटली व सुषमा स्वराज को अपनी रणनीति सफल होती नजर आ रही है। भैरो सिंह शेखावत के खिलाफ इस चुनाव के दौरान जितने भी मुद्दे उठाए जाएंगे उन सभी का फायदा लाल कृष्ण आडवाणी को ही मिलेगा।