प्रतिभा के सामने प्रतिभा दिखाने की चुनौती (अंक 50)
Jul 24th, 2007 by admin
नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बहुजन समाजपार्टी की सुप्रीमो मायावती केञ् सहारे प्रतिभा पाटिल देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में रायसीना हिल (राष्ट्रपति भवन) पहुंचने में तो कामयाब हो गई हैं मगर देश के सर्वोच्च संवैधानिक मुखिया के रूप में उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। चुनौतियों से पार पाने के लिए उन्हें अपनी प्रतिभा दिखानी होगी।
इस बार राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दोनों की ही ओर से एक-दूसरे के उम्मीदवार के खिलाफ जिस प्रकार से कीचड़ उछालकर उसकी छवि को दागदार बनाने का प्रयास किया गया है, उससे राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल व भैरो सिंह शेखावत के प्रति आम जनता के मन में संदेह पैदा हुआ है। इतना ही नहीं इस प्रकार के चुनाव प्रचार से राष्ट्रपति पद की गरिमा को भी ठेस पहुंची है।
राष्ट्रपति चुनाव में वोटों के आंकड़ों में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, वाम मोर्चा व बहुजन समाज पार्टी की साझा उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल के आसपास भी नहीं फटकने के बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और खासकर भारतीय जनता पार्टी ने केवल श्रीमती पाटिल को कटघरे में खड़ा करने के उद्देश्य से भैरो सिंह शेखावत को चुनाव मैदान से हटने नहीं दिया। अपने इस मकसद में वह काफी हद तक कामयाब भी रही है।
इसलिए प्रतिभा पाटिल के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि वह राष्ट्रपति पद की गरिमा बढ़ाने के लिए विपक्ष की ओर से अपने परिवार वालों के खिलाफ लगाए आरोपों की जांच को किसी भी तरह से प्रभावित न होने दें। इसके साथ ही उन्हें अदालतों में चल रहे मामलों के बारे में भी यह सुनिश्चित करना होगा कि इनकेञ् फैसले जल्द सुनाए जाएं। वरना विपक्ष को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि राष्ट्रपति के परिवारजनों के मामले में जांच एजेंसियां सही ढंग से काम नहीं कर रही हैं। इसी वजह से अदालत मामले को लटकाती आ रही है। इन आरोपों की वजह से आम जनता के मन में राष्ट्रपति के प्रति कहीं न कहीं शक की भावना पैदा होगी। अगर ऐसा हुआ तो यह न तो राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुकूल होगा और न ही प्रतिभा पाटिल के हित में। वैसे संभावना इस बात की भी है कि अदालतें प्रतिभा पाटिल के परिजनों को निर्दोष करार दे देती हैं तब भी विपक्ष यह कहकर हल्ला मचाने का प्रयास करेगा कि अदालातों ने राष्ट्रपति के प्रभाव की वजह से ऐसा किया है। इसे देखते हुए प्रतिभा पाटिल को ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे इस प्रकार की धारणा को बल मिलता हो।
प्रतिभा पाटिल से पूर्ववर्ती राष्ट्रपति मिसाइल मैन डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने को जनता का राष्ट्रपति साबित कर अपार लोकप्रियता हासिल की है। उन्होंने अपनी विद्वता और व्यवहार से सबके दिल में विशेष स्थान बनाया है। आम तौर पर सभी तरह के विवादों से दूर रहने वाले डा. कलाम लाभ के पद विधेयक पर हस्ताक्षर करने के बजाय उसे पुनर्विचार के लिए सरकार को लौटा कर चर्चा का केन्द्र बन गए थे। हालांकि उन्होंने ऐसा कर अपनी मानसिक दृढ़ता का परिचय देने के साथ ही संवैधानिक पद के दायित्व का पालन ही किया था। बावजूद इसके उनके इस कदम ने यह साबित कर दिया कि वह सरकार के विधेयक या फैसलों पर विवेक केञ् बिना मोहर लगाने वाले राष्ट्रपति नहीं हैं। यह बात दीगर है कि महज इसी वजह से हर तरह की योग्यता रखने के बावजूद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने डा. कलाम को राष्ट्रपति की दूसरी पारी का मौका न देने का मन बना लिया।
राष्ट्रपति के रूप में डा. कलाम के कार्य व उनके विशिष्टस्न् व्यक्तित्व को देखते हुए यह स्वभाविक ही है कि राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा पाटिल के कामकाज व प्रत्येक फैसले की तुलना लोग डा. कलाम के कार्यकाल से करेंगे। यह प्रतिभा पाटिल के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान होगा।
यह सब जानते हैं कि आगामी आम चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रतिभा पाटिल का नाम तय किया है। उनसे उम्मीद है कि वह पार्टी हितों को ध्यान में रखते हुए ही काम करेंगी। प्रतिभा पाटिल के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस धारणा को पूरी तरह से गलत साबित करने की है। इसके लिए उन्हें संविधान के संरक्षक की भूमिका निभाते हुए इस प्रकार के फैसले लेने होंगे जिससे लोगों में यह संदेश जाए कि वह केवल रबर स्टैंप नहीं हैं। हालांकि सरकार और राष्ट्रपति के बीच वैचारिक मतभेद होने में कोई बुराई नहीं है। अगर देखा जाए तो जनहित व लोकतंत्र की भलाई की भावना के कारण ऐसा होना स्वभाविक ही है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरूञ् के विचार आपस में मेल नहीं खाते थे। कई मौके ऐसे आए जब डा. राजेन्द्र प्रसाद के फैसले के अडिग रवैये के कारण नेहरू सरकार को किरकिरी का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके डा. राजेन्द्र प्रसाद को दुबारा से राष्ट्रपति बनाया गया। इसलिए प्रतिभा पाटिल को यह ध्यान रखना होगा कि उनके किसी भी फैसले से यह न लगे कि ऐसा कर उन्होंने अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह नहीं किया है।
देश के 13 वें राष्ट्रपति के सामने एक और चुनौती मुंह बाए खड़ी है, वह है उनके खिलाफ विपक्ष की ओर से महाभियोग चलाने की। राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान विपक्ष की ओर से प्रतिभा पाटिल के खिलाफ जिस प्रकार के गंभीर आरोप लगाए गए थे, उन्हें साबित करने के लिए वह ऐसी कोशिश कर सकता है। हालांकि संविधान और कानून दोनों ही विशेषज्ञों का मानना है कि आरोप लगाना एक बात है और उन्हें साबित करने में नाको चने चबाने पड़ते हैं। इसे देखते हुए अपनी फजीहत से बचने के लिए भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दल प्रतिभा पाटिल के खिलाफ महाभियोग चलाने का प्रस्ताव शायद ही रखें। फिर भी चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार के तेवर दिखाए हैं, उनसे ऐसी कोशिश करने की संभावना तो बनती ही है।