बाकी कुछ बचा तो….. (अंक 15-16)
Nov 27th, 2007 by admin
हाय महंगाई, महंगाई, महंगाई….। इन दिनों सबकी जुबान पर एक ही चर्चा है। गृहिणियां रोजाना इस बात का रोना रो रही हैं कि दाल महंगी, सब्जी महंगी, चावल महंगा, फल महंगा व दूध महंगा। प्याज अलग लोगों को रुला रहा है। आम आदमी का घरेलू बजट गड़बड़ा गया है। घर की औरतें कोई बचत नहीं कर पा रही हैं। उल्टा उन्हें महीने के आखिर में घर चलाने के लिए पैसे मांगने पड़ रहे हैं। साल भर पहले वे महीने के अंत तक कुछ न कुछ बचत जरूर कर लेती थीं। सरकार कह रही है मुद्रा स्फीति बढ़ गई है इसलिए महंगाई हो गई है। लेकिन आम लोगों को मुद्रा स्फीति की भाषा या उसका मतलब समझ में नहीं आता है। उन्हें तो बस इतना पता है कि जरूरत की हर चीजों की कीमत बढ़ गई है। उन्हें अपना घर चलाना मुश्किल हो रहा है। सरकार ने डीजल व पेट्रोल की कीमत कम कर दी है और भी कई कदम उठाए जा रहे हैं।
मीडिया में रोजाना खबरें छप रही हैं। महंगाई को लेकर चारों तरफ हाय तौबा मची है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार का बाजार पर कोई नियंत्रण नहीं है। देश में न तो चावल की कमी है और न ही गेहूं की। लेकिन उसकी वितरण व्यवस्था में दोष है। दूध के उत्पादन में भारत विश्व में अग्रणी है फिर भी दूध के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार ने कई प्रदेशों में चुनाव को देखते हुए फिलहाल पेट्रोल व डीजल के दामों में वृद्घि न करने का फैसला किया है लेकिन यह फैसला कुछ दिनों के लिए ही हो सकता है। पेट्रोल व डीजल के दाम बढ़ने से महंगाई में और बढोत्तरी हो जाएगी।
भारत जैसे देश में एक बार किसी रोजमर्रा की चीज की कीमत बढ़ गई तो बढ़ गई। चाहे उसकी लागत में लाख कमी आ जाए, बाजार में वह उसी दाम पर उपलब्ध होती है। मटन व चिकन के दाम को ही देख लीजिए। हर साल होली के समय मटन की कीमत बढ़ती है। वही साल भर तक जारी रहती है। कभी आपने सुना है कि आटे की कीमत दो रुपये प्रति किलो कम हो गई या दूध एक रुपये प्रति लीटर कम पर बिक रहा है। सरकार को इन्हीं चीजों पर नियंत्रण करना होगा। सब्जी को ही ले लीजिए। सरकार की तरफ से रोजाना अखबारों में इश्तहार दिए जा रहे हैं कि मंडी में आलू इस दर पर तो प्याज इस दर पर उपलब्ध है। लेकिन लोगों के घरों तक पहुंचने तक आलू-प्याज की कीमत में मंडी भाव के मुकाबले चार गुना इजाफा हो जाता है।
असल में इस बात पर कोई लगाम नहीं है कि मंडी से लाने के बाद किस चीज को किस दर से बेचा जाए। जैसा कि अन्य वस्तुओं में होता है। अगर आप पेस्ट लेते हैं या पॉलिश लेते हैं तो उस पर एमआरपी दिया होता है। सब्जी, चावल, आटा व अन्य रोजमर्रा की चीजों का कोई एमआरपी नहीं होता। दुकान पर बैठे दुकानदार ने जो मुंह से कह दिया वहीं एमआरपी हो जाता है।
कालोनी के बाजार में सब्जी व फल बेचने वाले तो इस मामले में सबसे आगे हैं। सब्जी व फलों के दाम तो वे आदमी को देखकर तय करते हैं। अगर आप कार से जाते हैं तो गोभी की कीमत क्म् रुपये किलो होगी अगर आप स्कूटर से जाते हैं तो यही कीमत 16 रुपये हो जाती है और पैदल जाने पर 12 रुपये। अब आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि सब्जी या फलों के फुटकर विक्रेता को कितना लाभ हो रहा है। क्या सरकार को वे कोई टैक्स दे रहे हैं। मनमानी कमाई कर उन्होंने रोजाना की हर चीजों की कीमत का प्रभावित किया है। सरकार की तरफ से ऐसा कोई इंतजाम नहीं है कि सब्जी व फलों के मूल्यों पर कोई नियंत्रण हो। जो भी हो कीमतों का उछलना अगर यूं ही जारी रहा तो आने वाले समय में यूपीए की सरकार को आम जनता का गुस्सा जरूर झेलना पड़ सकता है।