भाजपा की असलीयत (अंक 17)
Dec 3rd, 2007 by admin
जनसंघ से एक स्वच्छ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में उभरकर सामने आने वाली भारतीय जनता पार्टी भी अब अनुशासनहीन हो गई है। इसकी स्वच्छता, पारदर्शिता और अनुशासन समाप्त हो गया है। इसके अंदर बैठे कुछ मुट्ठी भर लोग ही इस पर काबिज होकर अनुशासन को भंग कर रहे हैं। जिससे अब यह साफ होने लगा है कि कल तक कैडर बेस पार्टी का दम भरने वाली इस पार्टी में न तो कोई कैडर बचा है और न ही इसका बेस। पार्टी का अनुशासन दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष पद के चुनाव में किस कदर टूटा है यह जगजाहिर है। प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव ही क्यों, मंडल और जिला अध्यक्षों के चुनाव में भी पार्टी के अनुशासन और उसके संविधान की धज्जियां उड़ाई गई हैं। यहां तो जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत को ही चरितार्थ किया जा रहा है। वरियता और वरिष्ठ तो दरकिनार हो गई है। अब आलम यह है कि खून पसीना बहा कर पार्टी को मजबूती प्रदान करने वाले कार्यकर्ता नींव का पत्थर बन कर रह गए हैं और बड़े नेताओं की गणेश परिक्रमा करने वाले तथाकथित नेता मंडल जिले व प्रदेश में काबिज हो गए हैं।
पार्टी की नीतियों के अनुसार दल का कोई भी सदस्य अगर एक बार पार्टी के अहम पद पर विराजमान हो जाता है तो वह दोबारा उस पद पर आसीन नहीं हो सकता। पार्टी के संविधान के अनुसार उस पद के लिए चुनाव होगा और लोकतांत्रिक तरीके से जो व्यक्ति चुना जाएगा वही उस पद का हकदार होगा। मगर इस बार दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी की नीतियों और संविधान को ताक पर रखकर डा. हर्षवर्धन को यह कहकर दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया कि विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। अगर ऐसी स्थिति में प्रदेश अध्यक्ष को बदला जाता है तो चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही नए अध्यक्ष के आने के बाद पार्टी में अंतर्कलह बढ़ जाएगी। इसके पूर्व भी निगम चुनाव के समय भी यही कहकर डा. हर्षवर्र्धन को प्रदेश अध्यक्ष बने रहने दिया गया था कि निगम चुनाव सिर पर है और प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव होने से पार्टी में दरार पैदा हो सकती है।
हालांकि पार्टी आलाकमान ने पार्टी में अंतर्कलह पैदा होने और नेताओं के आपसी संबंधों में दरार पैदा होने के भय से डा. हर्षवर्धन को ही अध्यक्ष पद पर बने रहने देने का निर्णय लिया है। लेकिन उसका यह निर्णय न तो पार्र्टी के हित में है और न ही उसके संविधान के दायरे में। इतना ही नहीं पार्टी के इतिहास में अब तक ऐसा नहीं हुआ है कि किसी एक ही व्यक्ति को दो बार प्रदेश अध्यक्ष के रूप में रहने दिया गया हो। कायदे के अनुसार यदि किसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दोबारा बनाया जाता है तो उसके पहले पार्टी के संविधान में संशोधन करना आवश्यक है। डा. हर्षवर्धन को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बने रहने देने की घोषणा होने से पूर्व भी इस बात की चर्चा थी। मगर अचानक पार्टी में बैठे कुछ नेताओं के कहने पर सभी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर उन्हें दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा कर दी गई।
आलाकमान के इस फैसले से एक ओर यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आघात पहुंचा है तो दूसरी ओर दल में अंतर्कलह भी पैदा हो गया है। क्योंकि जो लोग पहले से ही प्रदेश अध्यक्ष बनने का सपना संजोये बैठे थे उन लोगों ने खुले तौर पर पार्टी के इस फैसले का विरोध करना आरंभ कर दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री विजय गोयल ने तो बाकायदा पार्टी के इस फैसले का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया है। इसके अलावा ओम प्रकाश कोहली, प्रो. विजय कुञ्मार मल्होत्रा, प्रो. जगदीश मुखी, करण सिंह तंवर आदि अनेक ऐसे नेता हैं जो पार्टी के इस निर्णय को पचा नहीं पा रहे हैं। क्योंकि यह सभी नेता प्रदेश अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदारों में शामिल थे। हालांकि केन्द्रीय नेतृत्व ने मंडल और जिला स्तर पर हुए चुनाव के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं की जबरदस्त गुटबाजी के डर से प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करवाने का साहस न दिखा कर प्रदेश में यथास्थिति बनाए रखने का जो फैसला किया है उससे प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव को लेकर विभिन्न गुटों के बीच होने वाले झगड़े को तो फिलहाल रोक लिया है, लेकिन पार्टी में यह तूफान से पहले की शांति दिखाई देती है। विरोध का जो ज्वालामुखी विरोधी नेताओं के अंदर धधक रहा है, ऐसा न हो कि आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान वह लावा बन कर फूट पड़े और अपने ही पार्टी के सपनों को जला कर राख कर दे।