घूसखोर यातायात पुलिस (अंक 23)
Jan 21st, 2008 by admin
जब किसी चीज की अति हो जाती है तो व्यक्ति उस समस्या का स्वयं ही समाधान ढूंढने का प्रयास करता है। ब्ल्यू लाइन बस ऑपरेटरों ने भी दिल्ली की यातायात पुलिस के अत्याचारों से निजात पाने के लिए खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त पुलिसकर्मियों का स्टिंग ऑपरेशन कर दिया। दिलचस्प बात यह भी है कि अब तक भ्रष्ट नेताओं, सरकारी अधिकारियों, पुलिकर्मियों, काले धंधे में लिप्त व्यक्तियों का स्टिंग ऑपरेशन मीडियाकर्मियों द्वारा ही किया जाता रहा है। मगर यातायात पुलिसकर्मियों की ज्यादतियों से आजीज आकर अब बस ऑपरेटरों ने भी इससे निजात पाने केञ् लिए यह नायाब तरीका अखितयार कर लिया है।
वहीं दूसरी ओर यातायात पुलिसकर्मियों की कारगुजारियां भी काबिले तारिफ ही हैं। पुलिस की वर्दी पहनकर कानून को अपनी जेब मे रखकर सड़क पर वाहन चालकों और बस ऑपरेटरो से अवैध उगाही करने वाले पुलिस वालों ने भी अति कर रखी है। दो-चार हरे-हरे नोटों पर अपना ईमान बेचने वाले इन पुलिसकर्मियों ने ब्ल्यू लाइन बस ऑपरेटरों को न केवल मनमानी करने की छूट दे रखी थी बल्कि सड़कों पर ताण्डव मचाने का लायसेन्स भी दे रखा है। जिसके चलते राजधानी की सड़कों पर चलने वाले वाहन चालक दुर्घटनाग्रस्त होकर काल कवलित तो हो ही रहे है, साथ ही पैदल यात्रियों को भी सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। सड़क पार करने वालों के मन में अब भी हमेशा भय बना रहता है कि पता नहीं कब और किस तरफ से सड़क पर सरपट दौड़ती ब्ल्यू लाइन बस मौत बनकर उसे टक्कर मार दे। पुलिसकर्मियों की मिलीभगत से ताण्डव मचाने का लायसेन्स पाने वाले बस चालकों ने भी अति कर दी थी। यदि मीडिया ने इनकी कारगुजारियों को उजागर नहीं किया होता और सरकार पर दबाव न बनाया होता तो अब तक पता नहीं दिल्ली का क्या हश्र होता। लिहाजा सरकार ने ब्ल्यू लाइन बस ऑपरेटरों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। मगर इन घटनाओं की जड़ भ्रष्टाचार में लिप्त यातायात पुलिसकर्मियों पर हाथ रखने की कोशिश किसी ने नहीं की। यदा-कदा किसी मीडिया वाले ने इन पर स्टिंग करने की कोशिश भी की, मगर विभाग के आला अधिकारियों ने ही मामले को दबाने के ख्याल से गलत बयानी कर अपना पल्ला झाड़ लिया।
सरकारी तंत्र के रवैये से आजीज आकर ही एक बस ऑपरेटर ने यातायात पुलिस की पोल खोलने की ठान ली और उसने कड़ी मेहनत करके करीब 98 पुलिस कर्मियों को रंगे हाथ घूस लेते हुए कैमरे में कैद कर लिया। इसके साथ ही उसने अपनी मेहनत को सफल बनाने के लिए नायाब तरीका भी निकला और उसकी एक सीडी हाई कोर्ट को सौंप दी। इसे नीचता की हद ही कह सकते हैं कि एक जिम्मेदार पुलिस का कर्मचारी अथवा अधिकारी महज दो-चार सौ रुपये में अपना ईमान बेचकर मानवता को समाप्त करने में मशगूल हो जाता है। अगर स्टिंग ऑपरेशन की सच्चाई को माना जाए तो एक छोटे रूट पर चलने वाली बस के ऑपरेटर को प्रत्येक लाल बत्ती पर प्रतिमाह दो सौ रुपये के हिसाब से करीब भ् रुपये माहवारी घूस देनी पड़ती है। पुलिसकर्मियों की पोल खोलने के लिए यह स्टिंग ऑपरेशन पश्चिमी दिल्ली के अधिकांश चौराहों पर किया गया है।
स्टिंग ऑपरेशन चाहे किसी भी चौराहे पर किया गया हो। मगर एक बस ऑपरेटर ने यातायात पुलिस की ज्यादतियों से निजात पाने के लिए जिस प्रकार की हिम्मत दिखाई है उससे उन्हें समझ जाना चाहिए कि पुलिसकर्मियों को सुधर जाना होगा वरना उनका भविष्य अंधकारमय है।