जिंदगी की कीमत? (अंक 29)
Feb 25th, 2008 by admin
सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की मौत दिल्ली शहर के लिए आम बात है। हर साल दिल्ली की सड़कों पर लगभग 2500 लोग किसी न किसी वाहन के शिकार हो जाते हैं। रोजाना कम से कम चार पांच लोगों के सड़क हादसे में मरने की खबरें आती हैं। तेज गति से बसे आती हैं, वाहन आते हैं और लोगों को कुचल कर चले जाते हैं। वाहनो के शोरगुल में मरने वाले की चीख भी दब जाती है। हालांकि कई बार लोग जमा हो जाते हैं। दुर्घटना करने वाले वाहन को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। ड्राइवर को मारते-पीटते हैं। कुछ देर बाद पुलिस आती है। मृतक के घर वालों को सूचित किया जाता है और भीड़ छट जाती है। संवेदनशील व्यक्ति सहानुभूति जताते हुए अपने-अपने घर चले जाते हैं और यहीं से शुरू होती है मरने वाले के परिवार की दुखभरी कहानी।
अगर मरने वाला परिवार का पालनकर्ता हो तो यह कहानी अत्यंत दुखदायी और भयावह होती है। परिवार को खिलाने वाला मर चुका है अब उसकी लाश को पुलिस से लेने के लिए उसकी असहाय पत्नी और बच्चे धक्के खाने लगते हैं। पुलिसवाला कहता है एंबुलेंस बुलाओ। एंबुलेंस आती है और मनमाना पैसा मांगती है। मजबूरी में उन्हें देना पड़ता है वरना उन्हें एक दो घंटे तक लाश को सड़क पर ही छोड़ना पड़ेगा। लाश लेकर शवगृह में पहुंचते ही चील कौवे की तरह वहां के कर्मचारी शव परीक्षण को सही तरीके से अंजाम देने के लिए पैसे मांगने लगते हैं। इधर पुलिस वाला उनसे कुछ वसूलने की फिराक में लगा रहता है। जैसे-तैसे अंतिम संस्कार होता है। अब मृतक के परिजनों के पास खाने के लिए पैसा तक नहीं। दूसरी ओर जिस वाहन की टक्कर से उस आदमी की मौत हुई उसके ड्राइवर को जमानत मिल जाती है और वह घर जाकर अच्छा भोजन कर चैन की नींद सो जाता है। इंश्यारेंस कंपनी वाले अपने सर्वेयर को भेज देते हैं। उसके वाहन का सर्वे होता है और जल्द ही उसके क्षतिग्रस्त वाहन की भरपाई हो जाती है। दूसरी ओर मृतक के परिजन मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें खाने लगते हैं।
इंश्यारेंस कंपनियां उनकेञ्दावों में पचास गलतियां निकालने लगती हैं। पुलिस कहती है वह तभी साथ देगी जब मुआवजे की रकम से उन्हें भी कुछ हिस्सा मिलेगा। सड़क दुर्घटनाओं के पीडि़त पक्षों के प्रति पुलिस प्रशासन और निचली अदालतों के रवैये पर हाई कोर्ट ने जमकर लताड़ लगाई। कोर्ट ने कहा कि हमारी प्रणाली में पीडि़तों की सुनवाई की गुंजाइश कम है। हाई कोर्ट ने पीडि़त पक्ष को मिलने वाली मुआवजे की राशि को भी कम बताया है। सबसे बड़ी बात है यह है कि इससे सरकार का चरित्र साफ होता है। सरकारी तंत्र वाहन मालिकों के पक्ष में दिखता है। ट्रैफिक कानून की धज्जियां भी इसी कारण उड़ रही हैं। ब्ल्यू लाइन बसों द्वारा लगातार की जा रही दुर्घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इन बसों को कानून के दायरे में लाना सरकार के लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है यह विडम्बना है कि जिन पर कानून बनाने व उसे लागू करने की जिम्मेदारी है वह किसी न किसी रूप में इन जानलेवा बसों के जीवन रक्षक बने हुए हैं। हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी से सरकार को सबक लेना चाहिए आखिर कब तक हम अपने खोखले रवैये को ढोते रहेंगे। मानव जिंदगी मूल्यवान है और हमें इसे समझना होगा। लेकिन हमारी सरकार तो इसकी कीमत नैनों कार की कीमत से भी कम लगाती है। आखिर कब तक हमारी कीमत ऐसी बनी रहेगी?