चुनावी बजट (अंक 30)
Mar 3rd, 2008 by admin
आम जनता के लिए आशातीत आम बजट वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा पेश कर दिया गया। इससे सभी खुश नजर आ रहे हैं। क्या राजनेता और क्या किसान, क्या उद्योगपति और क्या गृहपति, सभी के दिलों में खुशी हिचकोले मार रही है। मगर यह बजट भी एनडीए सरकार के बजट की तरह लोकलुभावना ही है। क्योंकि यूपीए की सरकार ने अपने अंतिम बजट में जिन वस्तुओं की कीमतों और उसके करों में कमी करने का एलान किया है उससे आम जनता और गरीब किसानों का कोई लेना-देना है। आम जनता को अगर किसी चीज से लेना-देना है तो वह है रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली वस्तुएं। सरकार ने कार की कीमतों में तो कमी की है मगर चावल, गेहूं, सरसों तेल, नहाने-धोने के साबुन, सोडा, दाल आदि की कीमतों में किसी प्रकार की कमी अथवा छूट नहीं दी है। इसी प्रकार सरकार ने किसानों के कर्ज की माफी का भी एलान किया है। मगर यह एलान उन किसानों के लिए कारगर नहीं है जो देश के सूदखोरों के चंगुल में फंसे हुए हैं।
देश के कुल किसानों में करीब दस प्रतिशत ही किसान ऐसे हैं जिन्होंने उन्नत खेती करने और उसका संसाधन जुटाने के नाम पर बैंकों से कर्ज लिया है। बाकी के 90 फीसदी किसानों ने अब भी अपने गांव या आस-पड़ोस के सूदखोरों से कर्ज ले रखा है। सरकार ने भले ही किसानों की कर्ज माफी के लिए घोषणा की है लेकिन इससे किसानों द्वारा आत्महत्या करने की दर में कमी नहीं आएगी। सरकार को अगर किसान हित में ही करना था तो वह देश से सूदखोरी की प्रथा को समाप्त करने का उपाय करती। अपने ही कृषि मंत्री शरद पवार को अपनी आदतों और मुनाफाखोरी में सुधार करने के लिए ताकीद करती।
सरकार ने किसानों के लिए जो कुछ भी किया है उससे गरीब किसानों को नहीं बल्कि उन किसानों को फायदा होगा जो समृद्ध तथाकथित किसान नेता हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार ने किसानों की कर्ज माफी के नाम पर 60 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान तो कर दिया है मगर यह 60 हजार करोड़ रुपये आयेंगे कहां से? यदि इस माफी की रकम सरकार अपनी ओर से देती है तो उसका अतिरिक्त भार उद्योग जगत पर पड़ेगा और अगर नहीं देती है तो बैंकों को इसका भार सहन करना पड़ेगा।
इसी प्रकार सरकार ने कार, टीवी, मोटर साइकिल, सौंदर्य प्रसाधन और विलासिता की वस्तुओं की कीमतों और उन पर लगने वाले करों को कम करने का एलान किया है। मगर सरकार ने खाद्यान्नों, दलहनों, तिलहनों और रोजमर्रा के सामनों की कीमतों को यथावत रहने दिया है। इसके साथ ही सरकार ने इनकम टैक्स में भी कमी करने का एलान किया है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इससे देश की आम जनता को क्या लेना देना है। अब भी हमारे देश में करीब 85 फीसदी आबादी ऐसी है जो या तो आयकर के दायरे में ही नहीं आती या फिर आय कर ही नहीं देती। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में तो अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी कम है कि उन्हें दो जून की रोटी भी समय से नसीब नहीं हो पाती। ऐसे में भला इन बीमारूञ् राज्यों सहित देश के अन्य राज्यों की जनता को इनकम टैक्स में कमी से क्या लेना-देना? हालांकि वित्त मंत्री ने जिस प्रकार का बजट पेश कर हर वर्ग के लोगों को लुभाने का प्रयास किया है वह एक नजर में तो काबिले तारीफ दिखाई देता है, लेकिन यदि बजट के दूरगामी परिणामों पर नजर डाली जाए तो इस बार का बजट जनता बजट कम चुनावी बजट ज्यादा लगता है।