एक और अहम फैसला (अंक 43)
Jun 3rd, 2008 by admin
आखिर वह घड़ी आ ही गई जिसका नीतीश कटारा के परिवार वाले पिछले छः साल से इंतजार कर रहे थे। लम्बी कानूनी लड़ाई और तमाम दाव-पेचों के बाद अदालत ने विकास यादव और विशाल यादव को नीतीश कटारा की हत्या का आरोपी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुना दी। सजा के बाद नीतीश कटारा की माँ नीलम कटारा ने जहां राहत की सांस ली है वहीं यादव परिवार के मुखिया एवं यूपी के बाहुबली नेता डी.पी. यादव अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की तैयारी में जुट गए हैं। खास बात यह है कि डी.पी. यादव ने घिसे-पिटे लहजे में अदालत का सम्मान करने की बात तो कही लेकिन साथ ही उन्होंने इस फैसले पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए मीडिया की भूमिका को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया।
हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा होना कोई नई बात नहीं है, दरअसल नई बात यही है कि बाहुबली डी.पी. यादव के बेटे और भांजे की करतूतों को उजागर करने में मीडिया ने बेखौफ होकर अपनी जिम्मेदारी निभाई। बावजूद इसके कि पुलिस कस्टडी में होते हुए भी इस ‘होनहार’ बेटे ने एक मीडिया कर्मी पर हाथ उठाने से भी गुरेज नहीं किया था। अपने बच्चों को पाक-साफ बताने वाले डी.पी. यादव यह भूल गए कि उनके बेटे पर यह कोई पहला आरोप नहीं है। इससे पहले जैसिका लाल हत्याकांड में भी सबूत नष्ट करने का दोषी करार देते हुए अदालत विकास यादव को तीन साल की सजा सुना चुकी है। यही नहीं सन् 1991 में भी विकास यादव पर हत्या का एक मामला दर्ज हुआ था, जिसे बाद में यूपी सरकार ने वापस ले लिया था। गौरतलब बात यह है कि उस समय डी.पी. यादव राज्य सरकार में मंत्री थे।
कुल मिलाकर अदालत के इस फैसले से जहां आम आदमी के मन में कानून के प्रति विश्वास मजबूत होगा वहीं दबंग और बाहुबली लोग अपराध करने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर जरूर होंगे। मीडिया की भूमिका की पूरी चर्चा किये बिना यह लेख अधूरा माना जाएगा। क्योंकि यह कोई पहला मामला नहीं है जब मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद अभियुक्त मामले को रफा-दफा करवाने में सफल नहीं हो सके। प्रियदर्शनी मट्टू कांड, जैसिका लाल हत्याकांड, तंदूर कांड, शिवानी भटनागर हत्याकांड और अब अरूषि मर्डर केस जैसे तमाम ऐसे उदाहरण हैं जिनमें बड़े-बड़े लोग शामिल पाए गए और सभी मामलों में मीडिया की भूमिका काफी सकारात्मक रही। जिसके कारण पीडि़त परिवारों को न्याय पाने में मदद मिली है और आरोपी सलाखों के पीछे पहुंच कर अपने किए पर पछता रहे हैं।