नौकरों का आतंक (अंक 45)
Jun 16th, 2008 by admin
राजधानी में सीनियर सिटिजन जिस तरह अपराधियों के सॉफट टारगेट बन रहे हैं, उसने पुलिस की नींद हराम कर दी है, साथ ही आम लोग भी दहशत में हैं। जब भी इस तरह की कोई वारदात होती है, नौकरों के पुलिस वेरिफिकेशन पर बहस छिड़ जाती है। नीति बाग इलाके में बुजुर्ग दंपात्ति की हत्या के बाद नौकरों के पुलिस वेरिफिकेशन पर सवाल खड़े हो गए हैं। लोग नौकरों के बारे में या तो सही जानकारी नहीं देते या अगर देते भी हैं तो नौकर की पुलिस वेरिफिकेशन में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। यह तथ्य भी सामने आया है कि राजधानी में रह रहे नेपाली और बांग्लादेशियों का पुलिस वेरिफिकेशन न तो संभव है और न ही पुलिस की इसमें दिलचस्पी है।
पुलिस का कहना है कि ज्यादातर लोग अपने नौकरों का पुलिस वेरिफिकेशन नहीं कराते हैं, इसलिए इस तरह की वारदातें होती हैं लेकिन इसी महीने मालवीय नगर इलाके के सर्वोदय एन्कलेव में जिस नौकरानी लूसी ने अपनी मालकिन और उनकी एक सहेली को नशीला पदार्थ खिलाकर लूटपाट की थी, उसका न सिर्फ प्लेसमेंट एजेंसी ने वेरिफिकेशन कराया था, बल्कि उसे नौकरी देने वाली युवती ने भी उसका पुलिस वेरिफिकेशन कराया था। इसके बावजूद यह वारदात कर गई और आज तक हाथ नहीं लग पाई। इसी प्रकार आनंद निकेतन और ग्रेटर कैलाश पार्ट-1 में भी नौकर ने नशीला पदार्थ खिलाकर लूटपाट की। यह भी सच है कि हाल में हुई ज्यादातर वारदातों को उन्हीं नौकरों ने अंजाम दिया, जिन्हें नौकरी मिले महीना भर ही हुआ था और जिनका कोई पुलिस वेरिफिकेशन नहीं कराया गया। लेकिन सवाल यह है कि जो लोग अपने नौकरों का वेरिफिकेशन कराने में रुचि दिखाते हैं, उनके नौकरों का वेरिफिकेशन ठीक तरह से होता भी है या नहीं।
ज्यादातर यही देखने में आता है कि जो लोग अपने नौकरों का पुलिस वेरिफिकेशन कराने में रुचि दिखाते हैं, उन्हें यह तक नहीं पता चल पाता कि वेरिफिकेशन हुआ भी है या नहीं और फिर यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहता है। पुलिस की मानें तो राजधानी में सबसे ज्यादा आतंक नेपाली और बांग्लादेशी नौकरों ने फैला रखा है। पिछले दिनों ज्यादातार घटनाओं को नेपाली नौकरों ने ही अंजाम दिया था। इनके अलावा राजधानी में बहुत से बांग्लादेशी भी नौकर बनकर जगह-जगह काम कर रहे हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मानें तो नेपाली और बांग्लादेशी नौकरों का ठीक तरह से पुलिस वेरिफिकेशन हो ही नहीं पाता क्योंकि उनका ताल्लुक दूसरे देशों से होता है। ऐसे नौकरों की वास्तविक पहचान तलाशना भी थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि ज्यादातर ये लोग अपनी पहचान छिपाकर रखते हैं। वारदात के बाद ये लोग सीधे नेपाल और बांग्लादेश भाग जाते हैं।
अपने पक्ष में पुलिस का एक तर्क यह भी है कि ज्यादातर लोगों के यहां नाबालिग नौकर काम करते हैं। ऐसे में जब पुलिस उनके दरवाजे पर पहुंचती है तो उन्हें लगता है कि कहीं पुलिस उन्हें चाइल्ड लेबर के आरोप में अंदर न कर दे। साथ ही यह डर भी सताता है कि अगर उन्होंने अपने नौकर से वेरिफिकेशन कराने के लिए कहा तो कहीं वह नौकरी छोड़कर न भाग जाए।