कांग्रेस की ‘अमर’ कहानी (अंक 49)
Jul 15th, 2008 by admin
चार साल से अधिक समय तक यूपीए गठबंधन का प्रमुख घटक दल रह चुके वाम मोर्चा ने आखिरकार केन्द्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले ही लिया। कल तक सरकार के समर्थक रहे वाम मोर्चा के नेता आज कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं और उस पर विश्वासघात करने का आरोप लगा रहे हैं। परमाणु करार को लेकर यूपीए गठबंधन व वाम मोर्चा के बीच आई दरार को भरने का जिम्मा समाजवादी पार्टी ने उठा लिया है। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है इस बात का प्रमाण जहां चार साल पहले कांग्रेस के धुर विरोधी वाम मोर्चा ने सरकार को समर्थन देकर दिया था वहीं कल तक सोनिया गांधी को विदेशी बहु और कांग्रेस को भ्रष्टस्नचारियों पार्टी कहने वाले सपा सुप्रिमो मुलायम सिंह यादव व उनके ‘हनुमान’ अमर सिंह ने आज कांग्रेस की गोद में बैठ कर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र की सही परिभाषा केवल भारत के नेता ही जानते हैं।
यह बात अलग है कि इस ‘मधुर मिलन’ के पीछे दोनों ही पार्टियों का अपना-अपना स्वार्थ है। लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान कांग्रेस फिलहाल इस स्थिति में नहीं है कि वह जल्द ही चुनावों का सामना कर सके। कमोवेश कुछ ऐसी ही स्थिति सपा की भी है। क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सबसे ताकतवर माने जाने वाली पार्टी सपा को माया ने जो पटखनी दी है उसे मुलायम व अमर सिंह अभी तक भूले नहीं हैं। उन्हें भी इस बात का अंदाजा है कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में लोकसभा चुनाव होते हैं तो विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में भी सपा को मुंह की खानी पड़ सकती है।
ऐसे में कांग्रेस को समर्थन देकर सपा एक ओर जहां लोकसभा चुनाव को फिलहाल टाल सकती है, वहीं अपने नेताओं के खिलाफ आय से अधिक संपात्ति के मामलों की जांच प्रभावित भी करवा सकती है। जाहिर सी बात है कि वाम मोर्चा के समर्थन वापसी के बाद 39 सांसदों वाली सपा का महत्व सबसे ज्यादा हो गया है। अमर सिंह राजनीति की शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं वे किसी भी मौके का लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं। जिस बात का इशारा उन्होंने समर्थन के तुरंत बाद विभिन्न मंत्रालयों के आलाधिकारियों से एक बैठक कर दे भी दिया है।
हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में सरकार बचाना कांग्रेस की मजबूरी है लेकिन इतना तय है कि सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक सपा सहित सरकार को बाहर व अन्दर से समर्थन दे रहे छोटे-छोटे दल कांग्रेस को एक ऐसी ‘द्रोपदी’ बना कर रखेंगे जिसका वस्त्र हरण करने वाले तो सभी होंगे लेकिन मदद करने वाला ‘कृष्ण’ कोई नहीं होगा। ऐसी स्थिति कांग्रेस और देश के लिए और भी ज्यादा दुखदायी होगी। जिसका खामियाजा भविष्य में कांग्रेस और देश को भी भुगतना पड़ सकता है।