सरकार ध्यान दे (अंक 47)
Jul 15th, 2008 by admin
बीस-पच्चीस साल पहले बोर्ड का रिजल्ट आता था तो सारे शहर में शोर मच जाता था। 60 फीसदी से ऊपर अंक लाने वाले छात्र खुद को भगवान का शुक्रगुजार मानते थे। लोगों की उन्हें वाहवाही मिलती थी। नामी-गिरामी कालेजों को ऐसे छात्रों का इंतजार रहता था। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। रिजल्ट आने पर शोर तो अब भी मचता है, खुशियां भी मनाई जाती है, लेकिन इनमें वैसे छात्र शरीक होते हैं जिन्होंने 90 फीसदी से अधिक अंक आसिल किये हैं। ऐसे सभी छात्र वाकई में काबिले तारीफ हैं। इनकी योग्यता पर कहीं कोई सवाल नहीं है। यह हमारे देश के लिए गौरव की बात है कि हम ऐसे छात्र पैदा कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि हमारे यहां पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम अन्य देशों के मुकाबले कमजोर है।
ये बच्चे हमारी बौद्घिक पूंजी हैं, जिनके निवेश से हमारा देश तरक्की के मार्ग पर अग्रसर होगा। लेकिन हम उन छात्रों की भी उपेक्षा नहीं कर सकते जिन्होंने 70 फीसदी से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। ऐसी बात नहीं है कि उनमें प्रतिभा नहीं है या उन्होंने परिश्रम नहीं किया। परीक्षा में अंक हासिल करना अवश्य ही आपके तेज होने का सर्टिफिकेट है, लेकिन कई बार परिस्थितिवश तेज छात्र भी कम अंक हासिल करते हैं। क्या सरकार इन छात्रों को आगे बढ़ाने के लिये या प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है। इस सवाल पर सरकार घेरे में है।
जरा रिजल्ट पर गौर फरमाएं। 12वीं की परीक्षा में सिर्फ दिल्ली में एक हजार से अधिक बच्चों ने 90 फीसदी से अधिक अंक प्राप्त किए। स्वाभाविक है दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस कालेजों की सीट इन्हीं छात्रों से भर जाएगी। जिन छात्रों ने 80 फीसदी से अधिक अंक प्राप्त किए हैं निश्चित रूप से वे तेज हैं, लेकिन वे इन कैंपस कालेजों में पढ़ने के सपने को साकार नहीं कर पाएंगे। उन्हें दोयम दर्जे के कालोजों में दाखिले से ही संतोष करना पड़ेगा। सरकार इन छात्रों के साथ अन्याय कर रही है। जरा सोचिए जब इन कैंपस कालेजों की स्थापना हुई थी उस समय देश की आबादी क्या थी और अब क्या है।
20 साल पहले इन कालेजों में जितनी सीटें थीं आज भी उतनी ही हैं। मेरिट लिस्ट में आने वाले छात्रों को भी मनमाफिक कालेजों में दाखिला नहीं मिलता है तो उन्हें निराशा होती है और उनकी यह निराशा हम सबके लिए, हमारे देश के लिए नुकसानदायक है। क्योंकि यह छात्र हमारे देश की धरोहर हैं, हमारा भविष्य हैं। क्या सरकार का यह फर्ज नहीं बनता कि कैंपस कालेज के स्तर के अन्य कालेजों की स्थापना की जाए। दिल्ली विश्वविद्यालय देश की प्रीमियम यूनिवर्सिटी है और सभी मेधावी छात्रों की यह ख्वाहिश होती है कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कालेजों के छात्र बने।
अब वक्त आ गया है कि सरकार इन छात्रों के सपने को साकार करने का उपाय करे। क्या सभी प्रांतों की राजधानी में दिल्ली विश्वविद्यालय कैंपस की तर्ज पर विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की जा सकती है। मिसाइल और हथियार खरीदने पर खर्च करने से बेहतर होगा कि हम अपने मेधावी छात्रों पर निवेश करें। ये छात्र दूसरे देशों से खरीदे गए हर मिसाइल पर भारी पड़ेंगे। इन बातों पर गौर फरमाने का समय आ गया है। इसमें चूक करना देश की पूंजी को खोने के समान होगा।