सरकार ध्यान दे (वर्ष-6, अंक 3)
Sep 2nd, 2008 by admin
भारत ने ओलंपिक में तीन मेडल जीत लिए हैं, एक स्वर्ण तो दो कांस्य। इतने मेडल पहली बार भारत को ओलंपिक में मिले हैं, बहुत खुशी की बात है। भारतवासियों को भी कहने का मौका मिल गया है कि वे ओलंपिक में मेडल जीत सकते हैं। यह अलग बात है कि मेडल जीतने में चीन की बराबरी तो दूर उसके आस-पास पहुंचने में भी हमें सालों लग जाएंगे। हालांकि जब विकास की बात होती है तो हम अपना मुकाबला चीन से ही करते हैं या दूसरे देश भी चीन के बाद भारत को ही सबसे तेजी से बढ़ता देश मानते हैं।
खैर छोडि़ए इन बातों को, अभिनव ने भारत को शूटिंग में स्वर्ण पदक दिलाया है। बीजिंग आलंपिक में इस कारण भारत के राष्ट्रगान को बजने का मौका मिला। हर देशवासी का सीना फख्र से चौड़ा हो गया। हो भी कयों नहीं, हमारे देश में कोई फेलेप्स तो पैदा होता नहीं है कि इकट्ठे 6-7 स्वर्ण पदक जीत ले। इतने पदक तो हमने 60 साल में नहीं जीते। अगर अभिनव के स्वर्ण पदक को ही देखें तो उसकी चमक में भारत सरकार का कया योगदान है? वैसे उसकी जीत के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर हर बड़े लोगों ने उसे शाबाशी दी और उस पर इनामों की बौछार हो गई। चार-पांच करोड़ रुपये उसे इनाम स्वरूप मिल गए। लेकिन लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि अभिनव का कोचिंग पर सालाना खर्च एक करोड़ रुपये से अधिक का था और बीते पांच सालों से वह इस प्रकार की कोचिंग ले रहा था।
अभिनव जन्म-जात संपन्न है। उसकी प्रॉपर्टी क् करोड़ रुपये से अधिक की है। लेकिन हर शूटर अभिनव की हैसियत का नहीं होता। उसे तो सरकार से ही मदद की आस होती है। जिस दिन अभिनव को स्वर्ण पदक मिला उस दिन मिलखा सिंह कह रहे थे कि हर मां को ऐसा बेटा पैदा करना चाहिए। लेकिन होना यह चाहिए कि देश के हर शूटर को अभिनव जैसी सुविधा और कोचिंग मिलनी चाहिए और यह जिममेदारी सरकार की है। चीन के खिलाड़ी अमेरिका को पछाड़ रहे हैं, क्यों? क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देने की जिममेदारी वहां की सरकार लेती है। हमारे यहां तो क्रिकेट छोड़ किसी भी खेल पर खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं है। क्रिकेट पर भी सरकार नहीं बीसीसीआई खर्च करती है। हॉकी का तो यह हाल हो गया है कि ओलंपिक खेलने केञ् लिए हम कवालिफाई ही नहीं कर पाए। कितने दुख की बात है।
ओलंपिक के जिस खेल में हमने स्वर्ण पदक हासिल किया था आज हम उस खेल में हिस्सा लेने के काबिल भी नहीं रहे। बॉकसिंग और कुश्ति के विजेताओं को भी सरकार से कोई खास मदद नहीं मिली है। इन दोनों खेलों में खुराक की बड़ी अहमियत होती है। खुराक में अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है। इसलिए कोई गरीब घर का बच्चा भारत में न तो कुश्ति लड़ सकता है और न ही मुक्केबाजी कर सकता है। क्योंकि भारत में सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं होती है। गरीब बच्चों की प्रतिभा भूख और अच्छे भोजन के अभाव में दब जाती है। जो लोग इस हैसियत में होते हैं कि रोजाना 5-7 लीटर दूध पी सकें या उस प्रकार का खाना अपने पैसे से खा सकें, वही पहलवान बन सकता है या फिर मुक्केबाज।
आखिर बिहार, उड़ीसा या पूर्वी उत्तर प्रदेश से कोई मुककेञ्बाज या पहलवान पैदा タयों नहीं होता। कयों सिर्फ पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में ही इस प्रकार के खिलाड़ी होते हैं। कयोंकि ये राज्य अपेक्षाकृत संपन्न हैं और यहां के किसान परिवार अपने बच्चों को रोजना काफी मात्रा में दूध, घी, मकखन खिलाने में सक्षम हैं। लेकिन अन्य प्रदेशों में ऐसा नहीं है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मैडल तालिका में देश के नाम को चमकाने के लिए वहां की सरकार को भारी मशककत करनी पड़ती है। कोई बच्चा पेट से ही शूटर, मुककेञ्बाज या तीरंदाज पैदा नहीं होता। यह सब उसकी प्रेकटिस या उसे मिलने वाली सुविधा पर निर्भर करता है। सरकार से मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है। जिस देश के नेता और अफसर इन बातों को समझते हुए भी न समझें और खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करने की जगह खुद को प्रोत्साहित करने में लगे रहें, उस देश से कया उम्मीद की जा सकती है।