बेबस बिहार (वर्ष-6, अंक 5)
Sep 15th, 2008 by admin
बिहार में बाढ़ की विपदा कोई नई बात नहीं है। उत्तरी- बिहार में हर साल बाढ़ आती है और करोड़ों रुपये का नुकसान होता है। कोसी नदी का कहर भी कोई पहली बार नहीं बरपा है। करीब बीस साल पहले कोसी नदी की धार से बचने के लिए नेपाल सीमा पर बांध बनाया गया। पर इस बार कोसी की धार के आगे बूढ़े बांध की कुछ नहीं चली और बिहार के लगभग 11 जिलों में प्रलय जैसी स्थिति बन गई। रातों रात लोग बेघर हो गए, भिखमंगे हो गए। बिहार के छह जिलों में तो ऐसा लग रहा है जैसे यहां कभी कोई रहता ही नहीं था। यहां सिर्फ पानी ही पानी है। पहले से ही गरीबी में जी रहे बिहार वासियों को इस बाढ़ ने ऐसा डुबोया है कि उन्हें होश संभालने में कम से कम तीन साल लगेंगे। घर-द्वार, गाय-बैल न जाने क्या-क्या बाढ़ में बह गए।
भोले-भोले गांववासियों को यह पता तक नहीं चला कि कब बिहार की अभिशाप कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रशासन को भी इस बात की पूरी खबर नहीं लगी। असल में कोसी बांध की खबर कई सालों से नहीं ली गई। पानी का रिसाव शुरु हो चुका था लेकिन उस बांध तक जाने की जहमत बिहार सरकार के अधिकारियों ने नहीं उठायी। जब लोग डूबने लगे, मरने लगे तब जाकर उन्हें लगा कि यह तो प्रलय आ गया। राहत कार्य भी शुरु हुआ तो देर से। तब तक कई मां अपने बेटों से बिछड़ चुकी थीं, कई बच्चे अनाथ हो चुके थे तो कईयों की मांग उजड़ चुकी थी, बची थी तो सिर्फ उनके पेट की आग जो उन्हें भी जलाने को तैयार बैठी थी। लेकिन देर से ही सही राहत कार्यों ने लोगों को जिंदा रखा है।
प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रीय विपदा बताया और क् करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की और न जाने किन-किन लोगों ने प्रधानमंत्री राहत कोष से लेकर मुखयमंत्री राहत कोष तक में पैसे देने की बात कही है। लेकिन सवाल है कि इस राहत के पहुंचने तक क्या वे बच पाएंगे। उन्हें तो फौरी राहत चाहिए थी जिसके लिए बिहार प्रशासन तैयार नहीं था। प्रशासन पिछले साल बाढ़ में किए गए अपने कार्यों को अपनी उपलホधि मानता है। उसे इस बात का इल्म था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन इसकी तैयारी पहले से नहीं की गई। 30 लाख लोगों को राहत देना कोई आसान काम भी नहीं है। असली मदद वहां के स्थानीय लोग ही कर रहे हैं। शिविर लगाए गए हैं और हजारों लोग अपनी नई जिंदगी की उममीद में किसी तरीके से एक शाम मिलने वाली खिचड़ी खाकर अपना गुजर बसर कर रहे हैं। कई बच्चों ने तो इसी राहत शिविर में जन्म भी ले लिया है जिन्हें दूध की जगह बाढ़ का पानी पीना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात है कि राहत के लिए हाथ बढ़ाने में देश केञ् लोगों ने थोड़ी देरी जरूर की है। मुखयमंत्री नीतिश कुमार को भी प्रधानमंत्री से इसके लिए गुहार लगानी पड़ी।
किसी भी बड़े फिल्म स्टार या उद्योगपति ने प्रलयकारी बाढ़ की बात सुनने के बाद भी अपनी तरफ से मदद की कोई घोषणा नहीं की। नेता भी ईमानदारी से मदद करने की जगह बाढ़ पर अपनी राजनीति करते ज्यादा दिखे। सबको पता है जहां बाढ़ आती है वहां बीमारियां भी बहुत ज्यादा होती हैं और काबू नहीं पाने पर यह महामारी का रूप ले लेती हैं।
बिहार में डॉकटरों की कमी पहले से ही है। अगर दस प्रांतों से सौ-सौ डॉकटर इस दुख की घड़ी में वहां भेज दिए जाएं तो बहुत बड़ी मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसा कियो किया जाएगा? हर प्रांत की सरकार यह देखती है वहां सरकार किस पार्टी की है। भाजपा समर्थित सरकार है तो अन्य प्रांत की भाजपा सरकार ही इस प्रकार की पहल करेगी। दिल्ली नगर निगम ने चिकित्सा सेवा के 100 लोगों के दल को बिहार रवाना किया है जिसमें 30 डॉकटर हैं। अब जरा दिल्ली में रह रहे बिहारियों की बात करें। दिल्ली में 40 लाख से अधिक बिहारीवासी हैं। इनमें से पांच लाख लोग तो ऐसे जरूर हैं जो बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए पांच रुपये दे सकते हैं। ऐसे में यह रकम 25 लाख हो जाती है। लेकिन इस प्रकार की कोई पहल नहीं की गई। छठ पूजा के नाम पर बिहार के लोग मुमबई से लेकर दिल्ली तक रात में आर्केस्तरा करवाते हैं, नौटंकी करवाते हैं और लाखों रुपये फान्द देते हैं, लेकिन बिहार के बेबस लोगों के लिए इन लोगों ने कोई पहल नहीं की। दिल्ली में तथाकथित बिहारी नेता ने बड़े पैमाने पर ऐसा कियों नहीं किया? गरीबी झेल रहा बिहार भी भारत का ही अंग है और देश का विकास भी बिहार के विकास से जुड़ा है। बिहार को सोमालिया बनाकर हम भारत को पेरिस नहीं बना सकते हैं। परिवार में कम कमाने वाले सदस्य के बीमार पड़ने पर अमीर भाई के छोड़ देने पर उस परिवार का एक सदस्य चला जाता है, परिवार छोटा हो जाता है, एक सदस्य का योगदान खत्म हो जाता है। भारत की संस्कृति सबको साथ लेकर चलने की है और हमें अकेले नहीं बांट कर खाना सिखाया जाता है। जो भी हो विपाति की इस घड़ी में बिहार को सहारे की जरूरत है। देश के सक्षम हर हाथ को इस घड़ी में मदद के लिए आगे आने चाहिए। यह भी नहीं देखा जाना चाहिए कि बिहार में सरकार किसकी है। सरकार वहां किसी पार्टी की हो मुसीबत में फन्से लोगों की एक ही पार्टी होती है एक ही मजहब होता है और वह है बेबसी। उनकी आंखों में बस मदद की गुहार दिखती है। भारत इतना विशाल देश है और मुसीबत में हम तमाम दीवारों को तोड़ते हुए एक दूसरे के काम आए हैं और यही हमारी पहचान है, इसी से हम आज एक हैं। आओ हम सब मिल कर प्रतिज्ञा करें कि इस बार भी हम बिहार को डूबने के लिए नहीं छोड़ेंगे।