पुलिस को दिया अवैध कमाई का एक और जरिया (अंक - 33)
Mar 25th, 2007 by admin
राजधानी की सड़कों से मौत को दूर रखने और अनुशासनहीन वाहन चालकों को अनुशासन का पाठ सिखाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने यातायात के नियम तोडऩे वाले चालकों से 600 रुपए से अधिक वसूलने के निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने यातायात को सुचारू बनाने के संबंध में अनेक दिशा-निर्देश भी दिए हैं। उन पर महज चार हजार यातायात पुलिसकर्मी कैसे अमल करा पाएंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। मगर इतना अवश्य है कि इससे यातायात पुलिसकर्मी को अवैध कमाई का एक और जरिया मिल गया है।वैसे तो अभी भी अधिकांश मामलों में यातायात पुलिसकर्मी चालान काटकर जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में जमा कराने के बजाय ले-देकर मामला रफा-दफा कर देते हैं। वाहन चालक भी कार्रवाई से बचने के लिए चंद रुपए देकर अपना पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते हैं। अब तो यातायात नियम तोड़ने पर 600 रुपए अधिक देने होंगे। जाहिर है कि वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय यातायात पुलिसकर्मी के हाथ पर 100 से 200 रुपए देकर मामले को रफा-दफा कराने का प्रयास करेगा।दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। इस वक्त यहां लगभग 40 लाख से अधिक वाहन दौड़ रहे हैं। जिन पर निगरानी के लिए यातायात पुलिस के पास चार हजार कर्मी ही हैं। इनमें से भी ज्यादातर अतिविशिष्ट व्यक्तियों के आवागमन के समय यातायात व्यवस्था को नियंत्रित करने में लगे रहते। शेष यहां-वहां तैनात होकर उगाही करने में जुटे रहते हैं। जहां तक यातायात के नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों पर नजर रखने की बात है तो इस काम के लिए विभिन्न चौराहों पर 36 कैमरे लगाए गए हैं। जबकि 650 की जरूरत है। जब तक यातायात पुलिस कर्मियों की संख्या नहीं बढ़ाई जाती है और रवैये में सुधार नहीं किया जा रहा है। तब तक यह मान लेना कि न्यायालय के आदेश के बाद से दिल्ली में यातायात की समस्या हल हो जाएगी। यह आशा करना बेईमानी होगी। दरअसल जिन वाहन चालकों को सबक सिखाने के लिए यह दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उन पर तो इनका कोई खास असर होगा नहीं। क्योंकि ब्ल्यू लाइन बस वाले, चालकों ने तो यातायात पुलिसकर्मियों का महीना बांध रखा है। वह हर महीने अपने रूट पर पड़ने वाले चौराहों पर तैनात यातायात पुलिसकर्मियों को एक मुश्त राशि देते हैं। इसकी एवज में यातायात पुलिसकर्मी इन बसों को यातायात नियमों का उल्लंघन करते देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। यही वजह है कि प्रतिबंध के बावजूद प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल करना, तेज आवाज में टेप रिकॉर्डर बजाना, वर्दी न पहनाना और सिगरेट के छल्ले उड़ाना बस चालक अपना अधिकार समझते है।उल्लेखनीय है कि वजीरावाद स्कूली बस हादसे के बाद भी सरकार ने ब्ल्यू लाइन बसों पर अनुशासन का शिकंजा कसने का फैसला किया था। तब सभी बसों में गति नियंत्रण करने के लिए स्पीड गवर्नर लगाने, चालक के वर्दी पहनने और उस पर नाम पटि्टका लगाने, प्रेशर हॉर्न बजाने पर प्रतिबंध लगाने जैसे निर्देश जारी किए थे। कुछ दिन तक इनका असर दिखाई भी दिया। बाद में फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आया।इसी प्रकार यात्रियों से दुर्व्यवहार करना, मनमाना किराया वसूलना या यात्री के बताए स्थान पर जाने से इंकार करना तिपहिया चालकों की आदत बन चुकी है। यातायात पुलिस समय-समय पर विशेष अभियान के तहत तिपहिया चालकों के खिलाफ कार्रवाई करती है। मगर वह उंट के मुंह में जीरे के समान साबित होती है। जिसकी वजह से तिपहिया चालकों के मन में यातायात पुलिस के प्रति किसी प्रकार का भय ही पैदा नहीं होता है और वह यात्रियों को परेशान करने और मनमाना किराया वसूलने में लगे रहते हैं। हालांकि इस संबंध में तिपहिया चालकों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में तिपहिया के लिए किराया अन्य महानगरों की तुलना में सबसे कम हैं और सीएनजी के दामों में बार बार वृद्घि के बावजूद किराए में भी संशोधन नहीं किया गया। जिसकी वजह से वह मीटर से चलने के बजाय यात्री से पहले किराया तय कर लेते हैं। उनके इन तर्कों को मान भी लिया जाए तो भी उन्हें यात्रियों को मनमाने तरीके से लूटने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दरअसल कोई भी नया कानून या दिशा-निर्देश बनाने से ज्यादा जरूरी है मौजूदा कायदे-कानून का कड़ाई से पालन कराना और अपने काम में कोताही बरतने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना। ऐसा होने पर ही लोग स्वेच्छा से नियम कायदों का पालन करने लगेंगे। हमारे यहां कानून का डंडा चलाने पर तो जोर दिया जाता है। मगर उनके बारे में जनता को जागरूक बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यही वजह है कि लोग आसानी से उनकी धज्जियां उड़ाते रहते हैं। अगर वास्तव में यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाना है तो सबसे दिल्ली सरकार के परिवहन प्राधिकरण के कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास करने होंगे। क्योंकि इन्हीं कार्यालयों से अनाड़ी चालकों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं। इन्हीं कार्यालय से खतरनाक वाहनों को भी फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी कर दिए जाते हैं। बाद में यह ही सड़कों पर मौत का कारण बन जाते हैं। दिल्ली की सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या बढ़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण यहां प्रभावी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा न होना है। यह सही है कि अब कुछ मार्गों पर दिल्ली मेट्रो रेल सेवा शुरू की गई है। सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह है कि जिन इलाकों से मेट्रो गुजर रही है। वहां की सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या कम हुई है। वैसे भी दिल्ली का एकमात्र ऐसा है जहां सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा मजबूत करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि यहां परिवहन आवागमन के लिए निजी वाहनों पर निर्भरता काफी बढ़ी है। दरअसल भट्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट को लेकर दिल्ली सरकार काफी अर्से से दुविधा का शिकार रही है। कभी यहां की सड़कों पर हाइकैपेसिटी सें दौड़ाने की बात की जाती हैं तो कभी इलेट्रिक ट्रॉली या फिर ट्राम बस दौड़ने की योजना बनाती है। योजना की घोषणा करने के बाद सरकार उस पर अमल करना भूल जाती है। जिसकी वजह से यहां की यातायात व परिवहन समस्या दिनों-दिन जटिल होती जा रही है।