स्वयंभू भगवान बनने से जनता का भला नहीं होने वाला (अंक 43)
Jun 5th, 2007 by admin
राजस्थान की मुख्यमंत्री महारानी वसुंधरा राजे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बीच वैसे तो कोई समानता नहीं है। दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग है और राजनीतिक विचारधारा भी। वसुंधरा राजे का जन्म व लालन-पालन राजघराने में हुआ। वह भारतीय जनता पार्टी की नेत्री हैं। जबकि विलासराव देशमुख का जन्म आम परिवार में हुआ है और वह भाजपा की धुरविरोधी कांग्रेस के नेता हैं। मगर एक मामले में दोनों के बीच जबरदस्त समानता है। दोनों के ही समर्थकों ने उन्हें भगवान के रूप में दर्शाया है। जिस पर दोनों ने ही कोई आपति प्रकट नहीं की है। यह बात दीगर है कि उनके इस रूप को देखकर राजनीतिक बवाल पैदा हो गया है। मगर दोनों के कद को ही देखकर उनकी पार्टियां उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने में फिलहाल अपने को असमर्थ पा रही हैं।ऐसा लगता है कि वसुंधरा राजे और विवादों का चोली दामन का साथ बन गया है। वह विवादों में पड़ना नहीं चाहती है जबकि विवाद है कि उनके पीछे-पीछे चल आते हैं। वह विवादों से बचने के लिए राजस्थान छोड़कर बैंगलूर जाती हैं और दिल बहलाने के लिए ‘फैशनन-शो’ के रैंप पर उतरती हैं, तब भी उनके विरोधी इसे मुख्यमंत्री की मर्यादा के विरुद्घ आचरण बताते हुए बखेड़ा कर देते हैं। हालांकि रैंप पर उतरने को वसुंधरा राजे बिलकुल भी गलत नहीं मानतीं बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मसला बताती हैं।अभी यह मामला ठंडा नहीं पड़ा था कि एक विदेशी मेहमान को राजस्थान की मुख्यमंत्री ने जादू की झप्पी देकर अपने विरोधियों को आस्तीनें चढ़ाने का एक और मौका दे दिया। पिछली बार की तरह वसुंधरा राजे ने इस बार भी अपनी हरकत को गलत नहीं माना। उनका कहना था कि उन्होंने विदेशी पर्यटन और निवेश को बढ़ावा देने के लिए विदेशी मेहमानों को राज्य में आमंत्रित किया था। विदेशी मेहमान का उन्हीं के तौर तरीके के अनुसार स्वागत करना बुरी बात नहीं है। विदेशी संस्कृति के रंग में रंग जाने और भारतीयता का मखौल उड़ाने का आरोप लगाने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस बार अपने समर्थकों के जरिए ऐसा कलेंडर छपवाया है, जिसमें मुख्यमंत्री को देवी के रूप में दर्शाया गया है। इस बार भी उनके विरोधियों की भृकुटि तन गई है। इस बार तो भाजपा प्रवक्ता ने भी इनके समर्थकों के इस कृत्य की आलोचना की है। मगर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की संभावना के बारे में वह भी चुप्पी साध गए हैं। अगर राजस्थान में मुख्यमंत्री के समर्थकों ने उन्हें देवी के रूप में दर्शाया है, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के समर्थक भी उनके प्रति अपनी निष्ठ व भक्ति प्रकट करने के मामले में पीछे नहीं हैं। उन्होंने तो मुंबई में जो पोस्टर लगाया है उसमें विलासराव देशमुख को कृष्ण के रूप में दिखाया है। इस पोस्टर में मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्रवासियों की रक्षा के लिए अपने हाथ में गोवर्धन पर्वत उठा रखा है। इस तरह का पोस्टर बनवाने वाले शायद जुलाई 2005 में मुंबई में वर्षा के कारण हुई उस तबाही को भूल गए हैं, जिसमें सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई थी और हजारों बेघर हो गए थे। उस प्रलयंकारी वर्षा के दौरान राज्य सरकार और खासकर मुख्यमंत्री पूरी तरह से असहाय नजर आए थे।कृष्ण रूपी मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को गोवर्धन पर्वत उठाते हुए पोस्टर बनाने वालों ने एक तरह से मुंबईवासियों के जख्मों को हरा करने के साथ ही उन पर नमक छिड़कने का काम किया है। अगर विलासराव देशमुख ने मुख्यमंत्री के रूप ने ऐसे कदम उठाए होते जिससे मुंबईवासियों को जुलाई 2005 की तबाही का सामना न करना पड़ता तो एक पल के लिए उनकेञ् कृष्ण का रूप धारण करने को शायद पचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है कि जब राजनेताओं के समर्थकों ने उन्हें साक्षात भगवान बताने का प्रयास किया है। राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए यह नई बात जरूर है। अभी तक तो दक्षिण भारत के राज्यों की जनता खासकर तमिलनाडू व आंध्र प्रदेश के लोग ही अपने प्रिय अभिनेता द्वारा फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के कारण न केवल उन्हें भगवान की तरह पूजते थे बल्कि उन्हें इसी श्रेणी में रखते थे। ऐसे राजनेताओं में तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्व. एम.जी.रामचंद्रन व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री स्व. एन.टी. रामाराव का नाम सर्वोपरि है। खास बात यह है कि उन दोनों ने ही न केवल फिल्मों में बुराई का अंत करने वाले पात्र की भूमिकाएं निभाई बल्कि इन्होंने फिल्मों में भगवान के स्वरूप को भी साकार किया। राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होने के बाद भी इन नेताओं ने जनहित संबंधी कार्य कर और अपने-अपने राज्य की जनता के हितों की रक्षा के मामले को लेकर केन्द्र सरकार के साथ टकराव का रास्ता अक्तियार कर अपनी छवि को न केवल बरकरार रखा बल्कि उसे निखारने का काम भी किया। इन दोनों ने ही समय-समय पर यह भी साबित किया कि अपने-अपने राज्य की जनता के हितों की रक्षा के लिए वह मुख्यमंत्री की गद्दी को भी कुर्बान कर सकते हैं। उनकी जनता के बीच हितैषी की छवि और उनके कार्यों की वजह से उनके विरोधी भी उनको भगवान का अवतार घोषित करने का विरोध नहीं कर पाए। मुख्यमंत्री के तौर पर एम.जी. रामचंद्रन व एन.टी.रामराव ने जो काम किये थे उनकी वजह से तमिलनाडू व आंध्र प्रदेश की जनता आज तक भी उन्हें नहीं भूली है। इन दोनों राज्यों में राजनीति में आने वाला व्यक्ति एम.जी. रामचंद्रन व एन.टी. रामराव के नाम का सहारा लेकर ही चुनाव की वैतरणी पार कर सकता है। इन दोनों के जिक्र के बिना उनके राज्यों में राजनीतिक चर्चा कर पाना लगभग असंभव है। अगर इन्हीं की तरह वसुंधरा राजे व विलासराव देशमुख अपने-अपने राज्य की जनता के दिलों पर राज करना चाहते हैं तो उन्हें भी एम.जी.रामचंद्रन व एम.टी. रानाराव का अनुसरण करते हुए जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए स्वार्थों से ऊपर उठकर काम करने होंगे। वरना पोस्टर चिपकवाने या कलैंडर छपवाने मात्र से कोई इन्हें भगवान नहीं मान लेगा।