राष्ट्रपति का चुनाव भी राजनीति का अखाड़ा बना डाला (अंक 46-47)
Jul 3rd, 2007 by admin
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) को पूरी तरह से दलगत राजनीति से मुक्त रखने की व्यवस्था की है। बावजूद इसके देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के चयन के बाद से इस पद पर नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक आधार पर होती रही है। मगर इस बार देश के अगले राष्ट्रपति को लेकर तीनों प्रमुख राजनीतिक गठबंधन जिस प्रकार से बिसात बिछाकर एक-दूसरे को मात देने की चाले चल रहे हैं उससे राष्ट्रपति चुनाव राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया है। इस बार राष्ट्रपति पद के लिए केंद्र में सात्ताधारी कांग्रेस प्रतिभा पाटिल व भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जन तांत्रिक गठबंधन के समर्थित निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले भैरोसिंह शेखावत के बीच सीधी टタकर है, जिसमें वोटों के गणित के आधार प्रतिभा पाटिल का पलड़ा निश्चित रूप से काफी भारी है।
हालांकि अपने-अपने राज्यों के मतदाताओं द्वारा ठुकरा देने के कारण वहां की राजनीति के हाशिए पर पहुंच गए आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला उत्तर-प्रदेश के पूर्व मुチयमंत्री मुलायम सिंह यादव व अन्य ने अगले राष्ट्रपति के रूप में वर्तमान राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नाम उछालकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास किया है। अपनी निश्चित पराजय सामने देखकर भैरोसिंह शेखावत ने भी कह दिया कि अगर श्री कलाम चुनाव लड़ते हैं तो वह उनके समर्थन में मैदान से हट सकते हैं ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने यह कहकर इन सभी के मंसूबों पर पानी फेर दिया कि जीत सुनिश्चित होने पर ही वह चुनाव मैदान में उतरेंगे। जाहिर सी बात है कि कलाम साहब यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कांग्रेस एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों व उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा प्रतिभा पाटिल की उम्मीदवारी के नामांकन पत्र हस्ताक्षर करने के बाद अब इस मामले में उनका पीछे हटने का सवाल ही नहीं पैदा होता है।
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख सहयोगी दल शिवसेना ने ही सबसे पहले डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप मे दूसरी पारी का मौका दिए जाने का प्रबल विरोध किया था जिसकी वजह से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दूसरे घटक दलों ने भी इस मामले पर मौन साध लिया था। विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होने की वजह से वाममोर्चा भी अब्दुल कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति के पद पर बिठाने के पक्ष में नहीं हैं। इस तथ्य के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी की ओर से श्री कलाम को दुबारा राष्ट्रपति पद पर बिठाने की मांग करने के पीछे एक ही कारण नजर आता है वह कि अपनी पराजय सामने देखकर भारतीय जनता पार्टी के नेता उससे बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं राष्ट्रपति के रूप में डॉ कलाम की योग्यता पर किसी को शक नहीं होना चाहिए।
इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि अगर वह चुनाव लड़ने का फैसला ले लेते हैं तो सभी राजनैतिक दलों के नेता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनका समर्थन करेंगे। मगर श्री कलाम ने अभी तक अपने आचरण से जिस प्रकार से संवैधानिक प्रमुख के पद को जो गरिमा प्रदान की है और देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सミमान अर्जित किया है उसे देखते हुए यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह ऐसा कोई कदम उठायेंगे, जिससे लोगों को यह महसूस होने लगे कि डॉ. कलाम भी सात्तालोलुप राजनेताओं की तरह कुर्सी के भूखे हैं। यह सही है कि डॉ. कलाम ने एक गैर राजनीतिक व्यक्ति होने के बावजूद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और एस. राधाकृष्णन जैसे चिंतक व विचारकों की तरह राष्ट्रपति पद को शोभित कर उसे गरिमा प्रदान की है।
उन्होंने इस पर रहते जिस प्रकार का उदाहरण पेश किया है वह अपने आप में एक मिसाल है। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाना अगले राष्ट्रपति के लिए न केवल चुनौती पूर्ण होगा बल्कि लोग उसके कामों की भी डॉ. कलाम की उपलब्धियों से तुलना करेंगे। होना तो यह चाहिए कि राष्ट्रपति के रूप में इनके द्वारा किए गए कार्यों को देखते हुए सभी राजनीतिक दल डॉ कलाम को दुबारा से राष्ट्रपति बनाने का फैसला लेते मगर अपने-अपने राजनीतिक कारणों से उन्होंने ऐसा नहीं किया। दिलचस्प बात तो यह है किदेश की पहली महिला राष्ट्रपति देने पर अपनी पीठ थपथपाने और अपने मास्टर स्ट्रोक से विपक्ष को धराशायी करने वाली कांग्रेस की भी पहली पसंद प्रतिभा पाटिल नहीं थी बल्कि इस पद के लिए उसकी झोली में गृहमंत्री शिवराज पाटिल से लेकर प्रणव मुखर्जी, डा. कर्ण सिंह से लेकर अन्य तमाम नेताओं के नाम मौजूद थे।
मगर वाममोर्चा नेताओं इन सभी नामों को सिरे से खारिज करने के बाद उसने प्रतिभा पाटिल का नाम निकाला जिस पर वामदलों के नेता भी सहमत हो गए। इस प्रकार से देश में पहली बार किसी महिला के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचने के लिए रास्ता साफ हो गया। कहा यह जा रहा है कि प्रतिभा पाटिल की उनकी अन्य योग्यताओं के बावजूद इसलिए प्रत्याशी बनाया गया है क्योंकि वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उनके परिवार के प्रति वफादार रही हैं। उम्मीदवारों के चयन के समय सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत वफादारी और निष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। बावजूद इसके सोनिया गांधी को इस श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता कि एक महिला को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा कर भारतीय लोकतंत्र व महिलाओं को गर्व करने लायक अवसर उपलब्ध कराया है।
यह सही है कि सोनिया गांधी के सामने इस बात की मजबूरी थी कि देश का अगला राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए जो कि न केवल इस पद के योग्य हो बल्कि वह उनके प्रति पूरी तरह से वफादार भी हो। क्योंकि देश में 2009 में आम चुनाव होने हैं और पार्टी यह अच्छी तरह से समझ चुकी है कि केंद्र और राज्यों में किसी एक दल के पूर्ण बहुमत हासिल करने के दिन कब के लद चुके हैं। अब केंद्र व राज्यों में गठबंधन सरकारों का जमाना है जिनके गठन में राष्ट्रपति अहम भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि जहां कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति के धर्म की पसंद नापसंद का ध्यान है, वही व्यक्तिगत वफादारी को पैमाना बनाया है।
खंडित जनादेश व गठबंधन की राजनीति के वर्तमान दौर में राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अगर राष्ट्रपति अपना है तो उस पार्टी का काम काफी आसान हो जाता है। यही वजह है कि जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी ओर से कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है, वहीं प्रतिभा पाटिल का नाम सामने आने से पहले उम्मीवार के बारे में कांग्रेस व वामदलों के बीच पैदा हुए मतभेद का लाभ उठाने के लिए भाजपा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लंबा राजनीतिक अनुभव रखने वाले भैरों सिंह शेखावत को मैदान में उतारने का फैसला लिया था तब उम्मीद यह की जा रही थी कि अपनी छवि व व्यक्तिगत संपर्को के बल पर श्री शेखावत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटक दलों के वोटों में सेंध लगाकर अप्रत्याशित चुनाव परिणाम देने में सफल हो जाएंगे।
मगर कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को उम्मीदवार बनाकर इन सभी उममीदों पर पानी फैर दिया है। वैसे होना तो यह चाहिए था कि संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए सभी राजनीतिक दल राष्ट्रपति के चुनाव को दलगत राजनीति के दांव पेंच का अखाड़ा बनाने के बजाय आम सहमति से केवल योग्यता को ध्यान में रखकर ही देश के संवैधानिक मुखिया का चुनाव करते।
ताकि वह भी निष्पक्ष ढंग से अपने संवैधानिक र्काव्य व दायित्व का निर्वाह करता। जब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का चयन राजनीतिक दल और वोट के गणित के आधार पर होगा तो फिर वह अपने दल के हितों का ध्यान तो रखेगा ही। अगर देश का अगला राष्ट्रपति ऐसा ही करे तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।