बाजारवाद की चपेट में टी वी चैनल (अंक 50)
Jul 24th, 2007 by admin
वर्तमान समय में जब निहित स्वार्थों से प्रेरित होकर राजनेता से लेकर अपने को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मजहब के नाम पर लोगों में फूट डालने के साथ ही उन्हें आपस में लड़वाने की नई-नई साजिशें रच रहे हैं। ऐसे में पाक़ नगरी अजमेर शरीफ स्थित गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के गद्दीनशीन व खादिमों ने भगवान जगन्नाथ की यात्रा का पुरजोर स्वागत कर सांप्रदायिक सौहार्द व आपसी भाईचारे की नई मिसाल कायम की है।
भगवान जगन्नाथ की यात्रा की स्वागत करते हुए दरगाह के गद्दीनशीन ने यह कहा कि उन्होंने सदियों पुरानी हमारी गंगा-जमुनी सマयता को निभाते हुए ही ऐसा किया है। जब यात्रा दरगाह के मुख्य द्वार के सामने से गुजर रही थी, तो उसका इस्तकबाल करना हमारा फर्ज था। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब नवाज की दरगाह पर अपनी अकीकत के फूल चढ़ाने सभी मजहब के लोग आते हैं और उनमें पूरी श्रद्घा रखते हैं। जब गरीब नवाज अपनी दरगाह पर आने वाले इंसानों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरतते तो उनके खिदमतगार भला ऐसा कैसे कर सकते हैं। उनके इस कथन से ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा’ जैसी प्रसिद्घ नज्म लिखने वाले शायर इकबाल की यह पंक्तियां बरबस याद जाती है, ‘मजबह नही सिखाता आपस में बैर रखना।’
ख्वाजा गरीब नवाज के गद्दीनशीन व खिदमतगारों का यह जज्बा देखकर जहां हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो गया वहीं इस मामले में तमाम लोकप्रिय टी.वी. चैनल की भूमिका की देखकर शर्मसार भी हुए। मानवता, आपसी भाईचारे व सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने वाली इतनी बड़ी घटना के बारे में किसी भी चैनल ने छोटा सा समाचार भी प्रसारित करना उचित नहीं समझा। ऐसा लगता है कि इन चैनल वालों के लिए यह बात शायद समाचार लायक ही नहीं थी। ग़र दुर्भाग्य से भगवान जगन्नाथ की यात्रा के दौरान कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती तो तमाम टीवी चैनल 24 घंटे उस घटना को लाइव दिखाते हुए आसमान सिर पर उठा लेते।
खबरों के मामले में अपने को दूसरे चैनलों से आगे बताने और टीआरपी के मामले में अव्वल दर्शाने वाले टीवी चैनलों ने राष्ट्रीय हितों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है। अजमेर की घटना को कोई महत्व न देना इसका जीता जागता उदाहरण है। इन टीवी चैनलों के संचालकों को लगा होगा कि सांप्रदायिक सद्भाव देने वाली घटना को दिखाने से न तो उनके विज्ञापनों में इजाफा होगा और न ही उनकी टीआरपी बढ़ेगी। यही वजह है कि वह ऐसी बातों की ओर कोई ध्यान नहीं देते।
टीवी चैनल वालों की दृष्टिस्न् में विदेशी अभिनेता रिचर्ड गेरे का बालीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी को भावावेश में चूम लेने, पॉप गायक मिका व आयटम गर्ल राखी सावंत का चुंबन लेने की घटनाएं इतनी महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि वह दिन में कई-कई घंटों तक इन्हीं घटनाओं को दिखाते रहते हैं। इतना ही नहीं समाज में तंत्र-मंत्र करने वाले बाबाओं के विशेष कार्यक्रम दिखाने के साथ ही उटपटांग घटनाओं पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित करते रहते हैं। हद तो तब हो जाती है कि यह सामाजिक बुराइयां दिखाने के नाम पर अश्लीलता परोसने से भी बाज नहीं आते हैं।
इन टीवी चैनल के कार्यक्रम को देखते हुए ऐसा लगता है कि इस देश में पति-पत्नी के रिश्ते व बाबाओं के चमत्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। तब ही हर चैनल 24 घंटे इन्हीं बातों से संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहा है तो इन चैनलों के लिए दूसरे सभी मुद्दे गौण हो जाते हैं।
टीवी चैनल समाज में अराजकता फैलाने वाले नकारात्मक मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं। ऐसा करते समय वह यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि जो समाज में घटित हो रहा है वह वही दिखा रहे हैं। हमारा मक़सद तो ऐसी चीजों का दिखाकर जनता को उनके प्रति आगाह करना है। अपने को लोकतंत्र का सजग पहरेदार बताने वाले टीवी चैनल वास्तव में इसे ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। गलत एग्जिट पोल और चुनाव पूर्व सर्वेक्षण दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करना, विभिन्न मुद्दों पर लोगों की भावनाएं भड़का उन्हें व्यवस्था के विरूद्व उकसाना या करना जैसे काम टीवी चैनल वाले कर रहे हैं। ऐसा करते समय यह न केवल पत्रकारिता के मापदंडो की धज्जियां उड़ा रहे हैं बल्कि भारतीय प्रेस परिषद की आचार संहिता को भी तार-तार कर रहे हैं।
टीवी चैनल बाजारवाद को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम बनाते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनका अस्तित्व ही बाजार पर आश्रित है। यही वजह है कि वे बाजारवाद को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। ऐसा करते समय उन्हें इस बात का ध्यान भी नहीं रहता है कि समाज के प्रति उनका क्या कर्तव्य है।
टीवी चैनल हमारी संस्कृति के साथ ही हमारी भाषा से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। इन चैनलों पर बोली जाने वाली भाषा को न हिंदी कहा जा सकता है न इंग्लिश। वह इन दोनों भाषाओं का विकृत रूप हिंग्लिश है। यही वजह है कि उनकी नजर में राष्ट्रभाषा हिंदी का कोई महत्व नहीं है। यही कारण है कि वह न्यूयार्क में संपन्न हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के बारे में छोटा सा समाचर दिखाना भी गंवारा नहीं करते हैं।