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अहिंसा के पुजारी एवं अन्याय के खिलाफ ताउम्र संघर्ष करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मस्थली गुजरात की भूमि पर सोहराबुद्दीन शेख को आतंकवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद पुलिस कर्मी द्वारा उसकी पत्नी कौसर बी केञ् साथ बलात्कार कर उसे भी मौत के घाट उतार देने की घटना से वहां इंसानियत एक बार फिर से शर्मसार होने पर मजबूर हुई है। पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के बाद उसे आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा का सदस्य करार दिया था। बाद में उसकी पत्नी कौसर बी की इज्जात लूटने के बाद उसे भी मार दिया गया क्‍योंकि उसने पुलिस को कायराना तरीके से अपने पति की हत्या करते हुए देख लिया था। पुलिस के इस दावे पर कुछ देर के लिए अगर यकीन कर भी भी लिया जाए कि सोहराबुद्दीन शेख आपराधिक गतिविधियों मे लिप्त था, फिर भी उसे फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के लिए पुलिस को माफ नहीं किया जा सकता। पुलिस लोगों के जान माल की रक्षा के लिए है। मगर जब वह खुद ही लोगों की जान लेने और अराजकता पैदा करने जैसे कामों को अंजाम देने में जुट जाएगी तो फिर भला आम आदमी अपने प्राणों की रक्षा कैसे कर पाएगा। यह एक विचारणीय प्रश्न है। अब धीरे-धीरे इस बात के पुख्‍ता सबूत मिलने लगे हैं कि आतंकवाद निरोधक दस्ते ने पहले सोहराबुद्दीन शेख को नवम्‍बर 2005 में बंधक बना लिया और बाद में उसे कट्टर आतंकवादी बताते हुए गोली से उड़ा दिया। हालांकि पुलिस ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन शेख की मौत पुलिस मुठभेड़ के दौरान गोली लगने से हुई है। इस के अगले दिन ही भारतीय जनता पार्टी के पार्षद सुरेन्द्र जीरावाला के बंगले पर तैनात पुलिस के सब इन्सपैक्‍टर ने सोहराबुद्दीन शेख की पत्नी कौसर बी के साथ बलात्कार कर उसे जहर देकर मार दिया और उसकी लाश को जला दिया। इस दोहरे हत्याकांड में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा राजनेताओं का भी हाथ होने की आशंका है। उम्‍मीद के अनुरूप ही इस घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया है। मार्सवादी कम्‍यूनिस्ट पार्टी ने इस हत्याकांड के लिए गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को जिम्‍मेदार ठहराते हुए उन पर पुलिस का सांप्रदायीकरण करने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्‍ता प्रकाश जावड़ेकर ने आंकड़े देकर यह साबित करने का प्रयास किया है कि गुजरात की तुलना में दूसरे राज्यों में पुलिस की फर्जी मुठभेड़ में मरने वाले व्यक्‍तियों की संख्‍या काफी ज्यादा है। इसके लिए उन्होंने नंदीग्राम घटनाक्रम का हवाला देते हुए माक्‍र्सवादी कम्‍यूनिस्ट पार्टी को अपने गिरेंबा में झांकने की नसीहत दी है। उन्होंने इस हत्याकांड की सीबीआई से जांच कराने का पुरजोर विरोध किया है। जाहिर सी बात है कि इस हत्याकांड पर भी हमेशा की तरह राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकने में जुट गए हैं। यही वजह है कि किसी भी दल ने पुलिस के अपराधीकरण की गंभीर होती जा रही समस्या की ओर संकेत करने की जहमत तक गवारा नहीं की है। वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब इनाम, तरक्‍की या वाहवाही बटोरने के उद्देश्य से पुलिस ने लोगों को खूंखार आतंकवादी या खतरनाक अपराधी बताते हुए उन्हें मौत के घाट उतारा है। सच यह भी है कि बाहुबली, प्रभावशाली व्यक्‍ति व ताकतवर असमाजिक तत्वों के सामने पूरी तरह से बेबस नजर आने वाली पुलिस आम नागरिकों को अपनी ताकत और खाकी वर्दी के खौफ का अहसास कराने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती है। यही वजह है कि ऐसा शायद ही कोई दिन बीतता होगा जब पुलिसिया जुल्म की दास्तान सुनाई न देती हो। सोहराबुद्दीन शेख की हत्या के मामले में पकड़े गए गुजरात व राजस्थान राज्य के भारतीय पुलिस सेवा के तीनो अधिकारियों को जिस प्रकार से महिमा मंडित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, उसके घातक परिणाम सामने आ सकते हैं। इससे अपराधिक गतिविधियों में लिप्त पुलिस अधिकारी अपने कृत्‍य पर शर्मिंदा होने के बजाय गर्व से सीना फुलाकर चलने लगेंगे। इस घटना से यह भी साबित हो गया है कि अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखने के लिए पुलिस अधिकारी किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसकी वजह यह है कि उनके तबादले की बागडोर राज्य सरकार के हाथ में रहती है। राजनेताओं के इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसी स्थिति को देखते हुए ही सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार की प्रक्रिया लागू करने के तहत पुलिस अधिकारियों की नियुक्‍ति व तरक्‍की के मामलों से राज्य सरकार को अलग रहने के निर्देश दिए थे। जिनका पालन करने में अधिकांश राज्यों ने कोई दिलचस्पी नही दिखाई है। दरअसल राजनेता पुलिस को अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं ताकि अपने चहेतों को कानून की पहुंच से दूर रखने के साथ ही अपने विरोधियों का सफाया कराने के अपने मकसद में पूरी तरह से कामयाब हो सकें। समय आ गया है कि राज्य सरकारों के मनमाने तरीके से पुलिस अधिकारियों के तबादले करने की प्रक्रिया पर रोक लगवाने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि परिस्थिति विरोध के बिना किसी भी पुलिस अधिकारी को उसके कार्यकाल की निश्चित अवधि पूरा होने से पहले उसके पद से न हटाया जाए। इसके अलावा पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुफ़त रखने के लिए पुलिस से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र गठित करना भी इस दिशा में एक अच्छा कदम साबित हो सकता है। पुलिस सुधारों को लागू करने की दिशा में सुरक्षा आयोग गठित करना एक महवपूर्ण कड़ी है। अगर राज्य सरकार पुलिस अधिकारियों को गैर कानूनी कार्य करने के लिए बाध्य करती है तो वे अधिकारी इस आयोग का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसका उद्देश्य पुलिस को राजनेता व कार्यपालिका दोनों के खौफ से मुक्‍ति दिलाना है। मगर गुजरात व राजस्थान ने इस दिशा में पहल करने से साफ इन्कार कर दिया है। जिससे स्पष्ट होता है कि यह सरकारें नकेल अपने हाथ में ही रखना चाहती हैं। हालांकि इस संदर्भ में उनके तथ्य गुजरात हत्याकांड की रोशनी में स्वतः ही बेमानी साबित हो जाते हैं। समय की मांग तो यही है कि पुलिस को राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बनने से रोकने के लिए इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं। वरना वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब हम राजनीति का अपराधिकरण हो जाने की तरह पुलिस का भी अपराधिकरण होने का केवल रोना भर रोते रहेंगे।

दिल्ली की अव्यवस्थित होती जा रही यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित करने व सड़क से मौत को दूर रखने के लिए अदालती आदेश पर शुरु किया यातायात पुलिस का अभियान धीरे-धीरे टांय-टांय फिस्स साबित होता जा रहा है। शुरु में यातायात पुलिस ने चालान काट कर सरकारी खजाना भरने के काम में जो तेजी दिखाई थी, उसकी रफतार थम सी गई है। इसका यह मतलब हर्गिज नहीं है कि दिल्ली के वाहन चालक पूरी तरह से अनुशासित हो गए हैं और ब्‍ल्यू लाइन बसों ने अराजकता छोड़ दी है। हां इतना अवश्य हुआ है कि चालान काटने से जो रकम सरकारी खजाने में जमा होनी चाहिए थी वह यातायात पुलिस ने अधिकारी व कर्मचारियों की जेब में जा रही है। वैसे अदालत ने जिन ब्‍ल्यू लाइन बसों व अन्य भारी व्यवसायिक वाहनों के कारण होने वाली सड़क दुर्घटना व मौतों को देखते हुए वाहन चालकों को यातायात नियमों का पाठ पढ़ाने के लिए विभिन्न नियमों का उल्लंघन करने पर 500 रुपए का अतिरिक्‍त जुर्माना वसूलने का जो आदेश दिया था, उसका इन वाहन चालकों पर तो कोई खास असर होता नजर नहीं आया। आज भी ब्‍ल्यू लाइन बसों में तेज आवाज पर टेप रिकार्डर पर बजते गाने सुनने के साथ ही ड्राईवर को अपने साथियों के साथ सिगरेट अथवा बीड़ी के छल्ले उड़ाते हुए देखा जा सकता है। ब्‍ल्यू लाइन बस वाले सवारी को देखकर आज भी सड़क के बीचों बीच और बस स्टैंड के आगे या पीछे गाड़ी खड़ा करना अपना हक समझते हैं। इन के अप्रशिक्षित ड्राइवर यातायात नियम कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए सड़कों पर अराजकता फैलाए हुए हैं। जिनकी वजह से पैदल यात्रियों की बात तो दूर दूसरे वाहन चालकों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। अगर अदालती आदेश और जुर्माने की रकम में भरकम इजाफा करने मात्र से सड़क दुर्घटनाओं की संख्‍या कम हो जाती तो फिर अभियान के एक पखवाड़े के भीतर ही लगभग एक दर्जन लोग सड़कों पर दम नहीं तोड़ते। वैसे भी दिल्ली की सड़कों पर हर साल 1800 से 2000 व्यक्‍ति दुर्घटनाओं का शिकार होने के कारण दम तोड़ देते हैं। हालांकि यातायात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी कह सकते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर इस वक्‍त लगभग 51 लाख वाहन दौड़ रहे हैं इसे देखते हुए सड़क दुर्घटनाओं की संख्‍या काफी कम है। वह इस संबंध में दूसरे महानगरों में होने वाली सड़क दुर्घटना व इस कारण होने वाली मौतों की संख्‍या का हवाला देते हुए अपनी यातायात प्रबंधन की काबलियत को बेहतर साबित करने का भी प्रयास कर सकते हैं। मगर इस बात का उनके पास शायद ही कोई जवाब होगा कि 51 लाख वाहन और 3200 से भी अधिक चौराहों को भला चार हजार यातायात पुलिसकर्मी किस प्रकार नियंत्रित कर सकते हैं। जवाब तो उनके पास इस बात का भी नहीं होगा कि कुल 51 लाख वाहन चालकों में से कितनों के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस हैं और कितनों को यातायात के संकेतकों का सटीक ज्ञान है? मात्र 32 कैमरों की मदद से सारे शहर के यातायात पर कैसे नजर रखी जा सकती है। भले ही अदालती आदेश का मकसद यातायात नियमों का सख्‍ती से पालन कराके चालकों को अनुशासित रखता था। इसके पीछे यह मकसद भी रहा होगा कि यातायात नियम का उल्लंघन करने के लिए अधिक जुर्माना भरने की वजह से वाहन चालक भविष्य में ऐसा करने से तौबा कर लेंगे। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। जुर्माना अधिक होने की वजह वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय यातायात पुलिसकर्मी की मुट्ठी गर्म कर मामले को रफा-दफा कराने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इससे भी गंभीर बात तो यह है कि जिन ब्‍ल्यू लाइन व अन्य बसों के चालकों को अनुशासन के दायरे में लाने के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है उन पर इसका कोई भी असर पड़ता दिखाई नहीं देता है। ब्‍ल्यू लाइन बसें आज भी तेज रफतार से एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में रेस लगाते हुए दूसरे वाहन चालकों को दहशतजदा करती नजर आती है। दरअसल यह चालक सोचते हैं कि ‘सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का’ क्‍योंकि यह तो यातायात पुलिस वालों को हर महीने एकमुश्त रकम अदा करते हैं बदले में यातायात पुलिसकर्मी भी इन बसों की ओर से आंखें मूंदे रहते हैं। यदि कभी कभार अधिकारियों के दबाव की वजह से किसी बस को जब्‍त करने की नौबत आती भी है तो इसे थाने में ही सौदेबाजी कर छोड़ दिया जाता है। इस संबंध में पूर्वी दिल्ली के एक सहायक आयुक्‍त (यातायात) की टिप्पणी भी कम हैरतअंगेज नहीं है। जिसमें उन्होंने कहा कि यातायात के विभिन्न नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में उन्होंने क्ख् बसों को जब्‍त करने का आदेश दिया था। उनके इस आदेश के बाद कुछ बसों को थाने में लाकर खड़ा भी किया गया। मगर कुछ दिन बाद जब उन्होंने जांच की तो एक भी बस नहीं मिली। पता चला कि निचले अधिकारियों ने कागजी खानापूर्ति कर सब बसों को छोड़ दिया है। अदालत ने जिन वाहनों पर नियमों की लगाम कसने के लिए अभियान चलाने के आदेश दिए थे उन पर तो इसका कोई असर नहीं हो रहा है मगर अन्य वाहन मालिक इस अभियान की आड़ में यातायात पुलिस के उत्पीड़न का शिकार अवश्य हो रहे हैं। यातायात पुलिसकर्मी मनचाहे तरीके से किसी भी वाहन को रोक लेते हैं फिर छोटी सी छोटी कमी निकालकर उससे पैसे मांगते हैं। पैसे न देने पर वह 600 रुपए का चालान थमा देते हैं। ऐसे में अब हर वाहन चालक को अपने साथ 200-300 रुपए अधिक लेकर चलने पड़ते हैं। पता नहीं कब और कहां कोई यातायात पुलिसकर्मी हाथ का इशारा कर उन्हें रुकने के लिए कह दे। वैसे तो इस तरह के अभियान चलाने से पहले वाहन चालकों में यातायात नियमों के प्रति जागरुकता व स्वअनुशासन की भावना पैदा करना जरूरी है। इसके अभाव में यह उम्‍मीद करना बेमानी होगी कि केवल अभियान चलाने और लोगों के मन में भारी जुर्माना राशि का भय पैदा करने से ही दिल्ली की यातायात व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी। लोगों में यातायात नियमों केञ् प्रति जागरुकता पैदा करने के लिए उन्हें यातायात नियमों के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इस काम में समय और मेहनत दोनों की आवश्यकता है। भला यातायात पुलिस वाले इस पचड़े में क्‍यों पड़े। खासकर यह देखते हुए कि उनकी पांचों उंगलियां घी में हैं अगर चालान काटने से सरकारी खजाना भरता है तो वह कह सकते हैं कि उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है और अगर कहीं वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय ले देकर पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझता तो भी यातायात पुलिसकर्मी का भला होता है। वैसे भी अदालत में यातायात नियमों का सख्‍ती से पालन कराने के निर्देश दिए हैं उसने वाहन चालकों में जागरुकता पैदा करने, उन्हें प्रशिक्षित करने, दिल्ली सरकार के परिवहन प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा मजबूत करने के निर्देश तो दिए नहीं है। इसलिए इन सब बातों पर सिर खपाने की क्‍या जरूरत है। यह बात दीगर है कि इन दीर्घकालीन तमाम उपायों के बिना फौरी तौर पर चलाए जाने वाले किसी भी अभियान का असर शुरु के दो-चार दिन तो दिखाई देता है। उसके बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। यदि अदालत वास्तव में दिल्ली के यातायात को अनुशासित करना चाहती है तो समस्या के मूल तक जाकर उसे समाप्त करने के उपाय ढूंढने होंगे। किसी भी तरह के सतही प्रयास का तो वही नतीजा होगा जो इस अभियान का निकलता आ रहा है। एक सवाल यह भी उठता है कि यातायात पुलिस ने अपने कर्तव्य का पालन करने और मौत को सड़क से दूर रखने के लिए अदालती आदेश की प्रतीक्षा क्‍यों की? उसने अपने स्तर पर इस तरह के अभियान चलाने की आवश्यकता क्‍यों महसूस नहीं की। यातायात व्यवस्था को केवल अभियान के सहारे नियंत्रित नहीं किया जा सकता। क्‍योंकि यह तो सतत जारी रहने वाली एक प्रक्रिया है।

देश की आधी आबादी अभी भी आधा जीवन जी रही है। वह अपने अधिकारों से न केवल वंचित है बल्कि उस पर तरह-तरह की पाबंदियां भी थोपी जा रही है। अगर फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी एक विदेशी कलाकार को चुंबन दे देती है तो हिंदू अतिवादी नैतिकता की दुहाई देते हुए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। अगर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक हिंदू लड़की प्रियंका मुसलमान लड़के उमर से शादी कर लेती है तो इससे हिंदू व मुसलमान दोनों संप्रदायों के अस्तित्व पर आंच आ जाती है, लेकिन जब मुंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल में कैंसर पीडि़त 16 वर्षीय मासूम लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी कोख में पल रहे शिशु को जन्म से पूर्व ही मरने के लिए अभिशप्त छोड़ दिया जाता है तो न तो हिन्दुओं की आत्मा जागृत होती है और न ही मुसलमानों की। स्त्रियों को समाज में आज भी पुरुष की संपत्ति समझा जाता है और संपत्ति केवल भोग के लिए ही होती है। समाज की इसी मानसिकता के परिणामस्वरूप ही लड़कों की तुलना में लड़कियों की जन्म दर गिरती जा रही है। फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने विदेशी कलाकार रिचर्ड गेरे को अपनी मर्जी से चुंबन नहीं दिया था। बावजूद इसके हिन्दू अतिवादियों को यह अनैतिक और भारतीय संस्कृति का घोर अपमान लगा। उस अपराध के लिए जो कि शिल्पा शेट्टी ने किया ही नहीं उसके लिए जिम्‍मेदार ठहराते हुए जगह-जगह प्रदर्शन कर उसके पुतले जलाए जा रहे हैं। मगर इलाज के दौरान अस्पताल में बलात्कार का शिकार हुई युवती, अपने दोस्त से अपनी पत्नी का बलात्कार करवाने व उत्‍तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के बडगांव की पंचायत में महिला के बदले महिला की मांग करने वाले फैसले पर सभी संप्रदायों के ठेकेदार पूरी तरह से मौन हैं। दरअसल जब तक हमारे दिमाग में संपत्ति के रूप में जर और जमीन के साथ जोरू को भी शामिल करने की धारणा कायम रहेगी तब तक आधी आबादी अधिकारों से वंचित रह कर इसी प्रकार से अपने अरमानों का गला घोंटती रहेगी। अगर प्रियंका की तरह कोई लड़की अपने अधिकार पाने के लिए किसी उमर का हाथ थामने का साहस दिखाएगी तो उसके साथ समाज की सभी लड़कियों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अदालत के प्रियंका व उमर की शादी पर स्वीकृति की मोहर लगाने के फौरन बाद भोपाल के सिंधी समुदाय ने तालिबान की तर्ज पर फरमान जारी कर दिया कि लड़कियां अब दुपट्टे से मुंह नहीं ढकेंगी, न ही मोबाइल फोन का इस्तेमाल करेंगी और न ही दोपहिया वाहन चलाएंगी। यह सब जानते हैं कि गर्मी के मौसम में लू के थपेड़ों की मार से बचने के लिए मुंह ढंकने से बीमार पड़ने का खतरा कम हो जाता है। इसी प्रकार अगर किसी भी विषम परिस्थिति में यदि लड़की के पास मोबाइल है तो वह इसके जरिए पुलिस या अपने परिचितों से संपर्क कर उन्हें अपनी सहायता के लिए बुला सकती है। आंकड़े तो यही बताते हैं कि रिक्‍शा या अन्य वाहन के इंतजार में खड़ी लड़कियां मनचलों के हाथों छेड़छाड़ या दूसरी घटनाओं का ज्यादा शिकार बनती हैं। अगर हिन्दू संगठन यह सोचते हैं कि इससे लड़के-लड़कियों के मिलने के अवसर कम हो जाएंगे तो यह महज खाम ख्‍याली है। क्‍योंकि जिन्हें मिलना होगा वह मिलने के रास्ते निकाल ही लेंगे। मगर इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि सारी पाबंदियां लड़कियों पर ही क्‍यों थोपी जाए? क्‍या लड़कों पर भी किसी प्रकार की पाबंदी लगाने की हिम्‍मत उनमें है? नारी को भोग्या व संपत्ति समझने की मानसिकता का सबसे घिनौना रूप तो मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में देखने में आया है। इस अस्पताल में कैंसर बीमारी का इलाज कराने आई एक 16 वर्षीय मासूम बालिका को अस्पताल में ही कर्मचारियों ने अपनी हवस का शिकार बना डाला। विडंबना तो यह है कि डॉक्‍टरों अनुसार इस बालिका के पेट में पांच माह का गर्भ पल रहा है जबकि इसकी खुद की आयु केवल माह बची है।
इसी प्रकार औरत को संपत्ति एक अन्य घटना उत्‍तर के सहारनपुर जिले के बड़गांव में सामने आई है। इस गांव में दो बच्चों की मां अपने प्रेमी के साथ भाग गई। जिस पर उसके पति ने पंचायत में गुहार लगाई थी। पंचायत ने महिला को भगा ले जाने वाले परिजनों को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि वह महिला को लौटाने के साथ ही पीडि़त पति को एक लाख रुपए अदा करे। वरना वह व्‍यक्ति पत्नी को भगा ले जाने वाले व्यक्ति के परिवार को दो लाख रुपए देगा और इसके एवज में उनकी बहु-बेटी को प्राप्त कर उसके साथ कैसा सलूक करने के लिए स्वतंत्र होगा। यह भी एक प्रकार से तालिबानी फैसले की याद ताजा कराता है।
इस मामले में पुलिस की भूमिका भी कम शर्मनाक नहीं है। जिसने तालिबानी फैसला सुनाने वाली पंचायत के सदस्यों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना तो दूर उलटे इस मामले की शिकायत करने थाने पहुंचे लोगों को ही घर से फरार हुए प्रेमी जोड़े को 24 घंटे के भीतर पुलिस के सामने पेश करने का अल्टीमेटम दे दिया। स्त्री को संपत्ति मानने और रिश्तों की पवित्रता को कलंकित करने वाली तीसरी घटना देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुई। इस घटना में पति ने कार में ही अपने दोस्त को अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने को कहा। इस घटना से महिला को इतना गहरा सदमा पहुंचा है कि उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि कमल शांडिल्य और स्वाति ने लगभग दो वर्ष पहले ही प्रेम विवाह किया था और उनका एक साल का एक बेटा भी है। पिछले कुछ समय से दोंनों के बीच मिठास खत्म हो गई थी। स्वाति को सबक सिखाने के लिए ही कमल ने अपने दोस्त सौरभ को कार में ही स्वाति के साथ बलात्कार करने के लिए उकसाया था। यह सही है कि कमल और स्वाति के संबंध मधुर नहीं रह गए थे और दोनों अलग रहना चाहते थे तो कमल अपनी पत्नी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करवाने के बजाय उसे तलाक दे सकता था। अब समय आ गया है कि समाज की जर-जोरू व जमीन को एक साथ और बलशाली के अधीन रखने की धारणा को बदलना होगा। इसके लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा। युवा पीढ़ी को नए समाज की रचना के लिए स्वयं को भी नई उंचाईयों तक पहुंचाना होगा ताकि समाज उनके सामने खुद-ब-खुद नत-मस्तक हो जाए।

एक ही बिस्तर पर दो-दो, तीन-तीन मरीज इलाज व देखभाल के अभाव में दर्द से छटपटाते गंभीर रूप से जख्‍मी व बीमारों की चीख- पुकार और अपने मरीज की चीखें बर्दाश्त न कर पाने से उनके तिमारदारों की डाक्‍टर व नर्सों से दया की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाने के दृश्य किसी भी सरकारी अस्पताल में आम हैं। ऐसे में जब किसी अस्पताल के डाक्‍टर, नर्स व अन्य कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएंगे तब वहां आने वाले मरीज और उनके तिमारदारों की क्‍या हालत होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पिछले कुछ समय से छोटी-छोटी बातों को लेकर डाक्‍टर व नर्सों का अचानक हड़ताल पर चले जाने की घटनाएं आम हो गर्ई हैं। जिसकी वजह चिकित्सा सुविधाओं की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पूरी तरह से गड़बड़ा जाती है। लोकनायक अस्पताल के डाक्‍टरों ने अस्पताल में भर्ती एक मरीज के परिजनों के साथ हुई कहा सुनी के बाद अपनी सुरक्षा के प्रबंध करने की मांग को लेकर पिछले दिनों अचानक हड़ताल कर दी। आमतौर पर डाक्‍टरों केञ् रवैये की आलोचना करने वाली नर्सें व अस्पताल के कर्मचारी भी इस मुद्दे पर हड़ताल में शामिल हो गए। जिसके परिणामस्वरूप लोकनायक अस्पताल के साथ ही मौलाना आजाद मेडीकल कॉलेज, गुरू नानक नेत्र चिकित्सालय व सुश्रुत ट्रामा केंद्र की स्वास्थ्य व्यवस्था भी चरमरा गई। जिसकी वजह से सैकड़ों मरीज व उनके हजारों तिमारदारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। डाक्‍टरों का श्रमिक नेताओं की तरह हड़ताल पर जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। क्‍योंकि उनके इस कदम से अनेक जिंदगियां खतरे में पड़ जाती हैं। किसी को दूसरे व्यक्‍ति की जिंदगी से खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं है। डाक्‍टरों को यह भी सोचना चाहिए कि लोग उनमें भगवान का ही रूप देखते हैं। यही वजह है कि अपने परिजन को अस्पताल में लाते समय इलाज करने वाले डाक्‍टर में पूरी आस्था प्रकट करते हुए यह भरोसा जताते हैं कि वह मरीज के प्राण बचा लेगा। मगर जब डाक्‍टर ही प्राणरक्षक की बजाय प्राणभक्षक की भूमिका निभाने लगेंगे तो फिर भला मरीज और डाक्‍टर के रिश्ते ही भावना का क्‍या होगा?
डाक्‍टरी का पेशा न केवल सम्‍मानित है बल्कि एक डाक्‍टर बनाने पर सरकार को जनता से करों के रूप में प्राप्त लाखों रुपए भी खर्च करने पड़ते हैं। इस नाते भी डाक्‍टरों का समाज के प्रति जो कर्तव्य बनता है, उससे वह मुंह नहीं मोड़ सकते हैं। अस्पताल में आए मरीज को प्राणरक्षा व स्वस्थ समाज की रचना में योगदान देना डाक्‍टरों का कर्तव्य ही बल्कि उनके जीवन का उद्देश्य भी होना चाहिए। मगर ऐसा लगता है आज डाक्‍टर डिग्री के साथ ली गई उस शपथ को भूल गए, जिसमें उन्होंने सभी मरीजों का इलाज और उनके प्राणों की रक्षा करने में कोई कोर-कसर न रखने का प्राण लिया था। यह सही है कि अस्पताल में आने वाले मरीज के तीमारदारों को भी संयम से काम लेना चाहिए। उन्हें हर बात के लिए डाक्‍टरों से उलझने और हर बात के लिए उन पर दोषारोपण करने के बजाय उनकी बात समझने का प्रयास करना चाहिए। अगर उन्हें लगता है कि वास्तव में कोई डाक्‍टर इलाज में जान-बूझकर लापरवाही बरत रहा है तो वह इसकी शिकायत चिकित्सा अधीक्षक से कर सकते हैं। मरीज के परिजन का डाक्‍टर से सीधा भिड़ना या किसी भी दृष्टि से उलझना ठीक नहीं। खासकर यह देखते हुए कि उनके इस प्रकार के व्यवहार का खामियाजा दूसरे मरीजों को भुगतना पड़ सकता है। यह सही है कि सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों की बढ़ती संख्‍या की वजह से डाक्‍टरों को अतिरिक्‍त दबाव में काम करना पड़ता है। जिसकी वजह से अपने मरीज का विशेष ध्यान रखने वाले परिजन के साथ उनकी तकरार होना स्वाभाविक ही है। फिर भी डाक्‍टरों को भी संयम रखना चाहिए। उन्हें जीवन और मृत्यु के बीच झूलते अपने प्रियजन की दशा को देखकर परिजनों की जो दशा होती है उसे भी समझने का प्रयास करना चाहिए। वैसे भी किसी अनपढ़ व्यक्‍ति की बजाय एक डाक्‍टर से यह अपेक्षा करना गलत भी नहीं है कि वह अपने पास आने वाले व्यक्‍ति की मनोदशा भांपकर उसकी भावनाओं को शांत कर देगा। सरकारी अस्पतालों में दवा की कमी न होने, जरूरी जांच उपकरणों को सही रखने के साथ-साथ डाक्‍टर, नर्स व कर्मचारियों की पुख्‍ता व्यवस्था करना भी सरकार का दायित्व है। मगर ऐसा लगता है कि सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। उसकी चूक का खामियाजा मरीज, उनके परिजन व डाक्‍टर सभी को भुगतना पड़ रहा है। मगर दिल्ली सरकार और खासकर चिकित्सा विभाग ने सूझबूझ से काम लिया होता तो लोकनायक अस्पताल प्रकरण को टाला जा सकता था। अतीत में भी लोकनायक अस्पताल में मरीज के परिजनों व डाक्‍टरों के बीच मारपीट होने की घटनाएं घट चुकी हैं। डाक्‍टरों ने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों की ओर सरकार का ध्यान कई बार आकृष्‍ट कराया मगर सरकार ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अगर सरकार ने समय रहते उचित कदम उठाए होते तो अस्पताल में घटी घटना को टाला जा सकता था। सही बात तो यह है कि अस्पताल में दवा की कमी होने से लेकर उपकरण खराब पड़े होने और वहां बुनियादी सुविधाओं के अभाव तक के लिए मरीज और उनके परिजन डाक्‍टरों को जिम्‍मेदार ठहराते हैं। जबकि इन सबकी व्यवस्था करना सरकार का दायित्व होता है। लोकनायक अस्पताल में डाक्‍टर, नर्स व कर्मचारियों की हड़ताल के मामले में सरकार ने कितनी लापरवाही से काम लिया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब प्रधान सचिव (स्वास्थ्य) यह मान रहे थे कि डाक्‍टरों की मांगे सही हैं तो फिर उन्हें पूरा करने में 48 घंटे से भी ज्यादा का समय क्‍यों लगाया गया। अगर सरकार ने इस मामले में संवेदनशील रवैया अपनाया होता तो डॉक्‍टरों, नर्सों व कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने की नौबत ही नहीं आती और न ही मरीजों को परेशानी उठानी पड़ती। जब हम हड़ताल के कारण होने वाली मौतों के मामले में डाक्‍टरों को जिम्‍मेदार ठहराते हैं तो फिर भला उन्हें हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग क्‍यों नहीं की जानी चाहिए। इसी आधार के मद्देनजर दिल्ली सरकार को इस सारे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराके दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सके। समय आ गया है कि डाक्‍टरों का हड़ताल पर जाना कितना उचित है इस विषय पर राष्ट्रीय बहस चलाने के बाद सरकार इस बारे में एक देशव्यापी नीति तैयार करे। जिससे डाक्‍टरों के बार-बार हड़ताल करने पर रोक लगाकर हजारों मरीजों को असमय काल कल्वित होने से बचाया जा सके। डाक्‍टरों की हड़ताल का प्रश्न सीधे-साधे मरीजों के जीवन से जुड़ा है। इस संबंध में जल्द ही कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके साथ डाक्‍टर व मरीज के बीच आपसी विश्वास की भावना को भी पुनर्जीवित किया जाना चाहिए ताकि समाज में सदभाव कायम रह सके।

केंन्‍द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के इस कथन ‘मुलायम सिंह यादव के मुख्‍यमंत्रित्वकाल के दौरान उत्‍तर-प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई थी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर जुल्मोसितम ढाए गए, बावजूद इसके पार्टी ने उनकी सरकार को समर्थन दिया।’ इसे जायसवाल की साफगोई कहें या उनकी मजबूरी। मगर ऐसा कहते समय वह यह भूल गए कि उत्‍तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने और वहां निठारी जैसे नरसंहार सहित हुए सभी भीषण अपराधों के लिए मुलायम सिंह जितने दोषी हैं ठीक उतनी ही दोषी उसे समर्थन देने वाली कांग्रेस पार्टी भी है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री केवल इतना कह देने से ही अपने दायित्व से नहीं बच सकते कि राज्य में जंगलराज कायम होने के बावजूद उनकी पार्टी ने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक कर्तव्य निर्वाह करने के उद्देश्य से मुलायम सिंह सरकार को दिया समर्थन वापिस नहीं लिया। क्‍योंकि राज्य की जनता बार-बार होने वाले चुनावों से बुरी तरह से आजिज आ चुकी है। इसी तथ्य के मद्देनजर कांग्रेस के मुलायम सिंह को समर्थन देना जारी रखा। श्री प्रकाश जायसवाल यह वक्‍तव्‍य देते समय शायद यह भूल गए कि गृह राज्यमंत्री होने के नाते देश में कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की जिम्‍मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। अगर वास्तव में उनके पास इस प्रकार की सूचनाएं थीं कि उत्‍तर प्रदेश में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची और राज्य सरकार आपराधिक तत्वों को संरक्षण दे रही है। तो सवाल यह उठता है कि गृह राज्यमंत्री के नाते उन्होंने संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और कांग्रेस पार्टी का ध्यान इस ओर आकृष्‍ट कराते हुए मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त करने का आग्रह क्‍यों नहीं किया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि खुद श्री प्रकाश जायसवाल ने इस मामले में मुलायम सिंह सरकार को बर्खास्त करने की दिशा में पहल क्‍यों नहीं की? राज्य की जनता को भी यह जानने का पूरा-पूरा हक है कि केंद्र सरकार ने उसे ऐसी सरकार के रहमो-करम पर क्‍यों छोड़ दिया जो उनके जान-माल की रक्षा करने में असमर्थ थी। जैसे ही केंन्‍द्र सरकार को यह लगा कि उत्‍तर प्रदेश सरकार अपराधों की रोकथाम और अपराधियों को पकड़ने के अपने दायित्व का पालन नहीं कर रही है उसे तभी बर्खास्त करने की कार्यवाही क्‍यों शुरू नहीं की गई। सवाल तो ऐसे और भी हैं, जिनके घेरे में गृह राज्यमंत्री और उनकी पार्टी दोनों ही आते हैं। वैसे भी अत्याचारी का साथ देने वाला स्वयं भी उतना ही दोषी होता है, जितना अत्याचार करने वाला। इसलिए मात्र अपनी साफगाई के बल पर गृह राज्यमंत्री और उनकी कांग्रेस पार्टी इस आरोप से मुक्‍त नहीं हो सकती कि मुलायम सिंह सरकार को समर्थन देकर उन्होंने गलत काम किया है। जहां तक संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य पालन की बात है तो केंद्र सरकार और खासकर गृह मंत्रालय इसका पालन करने में विफल रहा है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने मुलायम सिंह सरकार को इसलिए समर्थन दिया था ताकि वह उनकी केंद्र की संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का समर्थन करते रहें। दरअसल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही एक हाथ दे दूसरे हाथ ले की नीति पर अमल करने के तहत केंद्र व राज्य में सरकारों का समर्थन कर रहे थे। अब दोनों के रिश्तों में आई खटास आ गई, जिसकी वजह से दोनों दल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को मजबूर हो गए।एक बार फिर से श्रीप्रकाश जायसवाल के कानपुर में एक चुनावी कार्यक्रम में मुलायम सिंह सरकार के ऊपर आरोप लगाने वाले बयान पर लौटते हैं। ऐसा लगता है कि राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर मुलायम सिंह सरकार पर आक्रमण करने की झोंक में आगे बढ़ते समय शायद वह यह भूल गए कि यह मुद्दा बैक फायर भी कर सकता है। लोग राज्य में कानून व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर केंद्र सरकार के मूक रहने पर कांग्रेस से भी जबाव मांग सकते हैं। केवल आरोप लगाकर ही केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अपनी जबावदेही से मुक्‍त नहीं हो सकते। हां अगर उन्हें चुनाव से ऐन पहले ही इस बात की जानकारी मिली है कि उत्‍तर प्रदेश में कानून व्यवस्था काफी बिगड़ चुकी है तो बात दीगर है। वैसे तब यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि गृह मंत्रालय के अधीनस्थ खुफिया विभाग व अन्य एजेंसियां पांच साल तक इस बात का पता क्‍यों नहीं लगा सकीं और क्‍या ऐसी एजेंसियों पर देश की आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के लिए निर्भर रहा जा सकता है।बेहतर होता कि श्रीप्रकाश जायसवाल विकास के मुद्दे को लेकर ही मुलायम सिंह सरकार पर निशाना साधते। क्‍योंकि कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और सांसद राहुल गांधी भी विकास के मुद्दे पर ही मुलायम सिंह सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। ऐसा करने पर श्रीप्रकाश जायसवाल का मंत्रालय और कांग्रेस पार्टी दोनों ही किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बच सकते थे।

राजधानी की सड़कों से मौत को दूर रखने और अनुशासनहीन वाहन चालकों को अनुशासन का पाठ सिखाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने यातायात के नियम तोडऩे वाले चालकों से 600 रुपए से अधिक वसूलने के निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने यातायात को सुचारू बनाने के संबंध में अनेक दिशा-निर्देश भी दिए हैं। उन पर महज चार हजार यातायात पुलिसकर्मी कैसे अमल करा पाएंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। मगर इतना अवश्य है कि इससे यातायात पुलिसकर्मी को अवैध कमाई का एक और जरिया मिल गया है।वैसे तो अभी भी अधिकांश मामलों में यातायात पुलिसकर्मी चालान काटकर जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में जमा कराने के बजाय ले-देकर मामला रफा-दफा कर देते हैं। वाहन चालक भी कार्रवाई से बचने के लिए चंद रुपए देकर अपना पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझते हैं। अब तो यातायात नियम तोड़ने पर 600 रुपए अधिक देने होंगे। जाहिर है कि वाहन चालक चालान कटवाने के बजाय यातायात पुलिसकर्मी के हाथ पर 100 से 200 रुपए देकर मामले को रफा-दफा कराने का प्रयास करेगा।दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्‍या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। इस वक्‍त यहां लगभग 40 लाख से अधिक वाहन दौड़ रहे हैं। जिन पर निगरानी के लिए यातायात पुलिस के पास चार हजार कर्मी ही हैं। इनमें से भी ज्यादातर अतिविशिष्ट व्यक्तियों के आवागमन के समय यातायात व्यवस्था को नियंत्रित करने में लगे रहते। शेष यहां-वहां तैनात होकर उगाही करने में जुटे रहते हैं। जहां तक यातायात के नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों पर नजर रखने की बात है तो इस काम के लिए विभिन्न चौराहों पर 36 कैमरे लगाए गए हैं। जबकि 650 की जरूरत है। जब तक यातायात पुलिस कर्मियों की संख्‍या नहीं बढ़ाई जाती है और रवैये में सुधार नहीं किया जा रहा है। तब तक यह मान लेना कि न्यायालय के आदेश के बाद से दिल्ली में यातायात की समस्या हल हो जाएगी। यह आशा करना बेईमानी होगी। दरअसल जिन वाहन चालकों को सबक सिखाने के लिए यह दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उन पर तो इनका कोई खास असर होगा नहीं। क्‍योंकि ब्‍ल्यू लाइन बस वाले, चालकों ने तो यातायात पुलिसकर्मियों का महीना बांध रखा है। वह हर महीने अपने रूट पर पड़ने वाले चौराहों पर तैनात यातायात पुलिसकर्मियों को एक मुश्त राशि देते हैं। इसकी एवज में यातायात पुलिसकर्मी इन बसों को यातायात नियमों का उल्लंघन करते देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। यही वजह है कि प्रतिबंध के बावजूद प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल करना, तेज आवाज में टेप रिकॉर्डर बजाना, वर्दी न पहनाना और सिगरेट के छल्ले उड़ाना बस चालक अपना अधिकार समझते है।उल्लेखनीय है कि वजीरावाद स्कूली बस हादसे के बाद भी सरकार ने ब्‍ल्यू लाइन बसों पर अनुशासन का शिकंजा कसने का फैसला किया था। तब सभी बसों में गति नियंत्रण करने के लिए स्पीड गवर्नर लगाने, चालक के वर्दी पहनने और उस पर नाम पटि्‌टका लगाने, प्रेशर हॉर्न बजाने पर प्रतिबंध लगाने जैसे निर्देश जारी किए थे। कुछ दिन तक इनका असर दिखाई भी दिया। बाद में फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आया।इसी प्रकार यात्रियों से दुर्व्यवहार करना, मनमाना किराया वसूलना या यात्री के बताए स्थान पर जाने से इंकार करना तिपहिया चालकों की आदत बन चुकी है। यातायात पुलिस समय-समय पर विशेष अभियान के तहत तिपहिया चालकों के खिलाफ कार्रवाई करती है। मगर वह उंट के मुंह में जीरे के समान साबित होती है। जिसकी वजह से तिपहिया चालकों के मन में यातायात पुलिस के प्रति किसी प्रकार का भय ही पैदा नहीं होता है और वह यात्रियों को परेशान करने और मनमाना किराया वसूलने में लगे रहते हैं। हालांकि इस संबंध में तिपहिया चालकों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में तिपहिया के लिए किराया अन्य महानगरों की तुलना में सबसे कम हैं और सीएनजी के दामों में बार बार वृद्घि के बावजूद किराए में भी संशोधन नहीं किया गया। जिसकी वजह से वह मीटर से चलने के बजाय यात्री से पहले किराया तय कर लेते हैं। उनके इन तर्कों को मान भी लिया जाए तो भी उन्हें यात्रियों को मनमाने तरीके से लूटने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दरअसल कोई भी नया कानून या दिशा-निर्देश बनाने से ज्यादा जरूरी है मौजूदा कायदे-कानून का कड़ाई से पालन कराना और अपने काम में कोताही बरतने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना। ऐसा होने पर ही लोग स्वेच्छा से नियम कायदों का पालन करने लगेंगे। हमारे यहां कानून का डंडा चलाने पर तो जोर दिया जाता है। मगर उनके बारे में जनता को जागरूक बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यही वजह है कि लोग आसानी से उनकी धज्जियां उड़ाते रहते हैं। अगर वास्तव में यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाना है तो सबसे दिल्ली सरकार के परिवहन प्राधिकरण के कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास करने होंगे। क्‍योंकि इन्हीं कार्यालयों से अनाड़ी चालकों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं। इन्हीं कार्यालय से खतरनाक वाहनों को भी फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी कर दिए जाते हैं। बाद में यह ही सड़कों पर मौत का कारण बन जाते हैं। दिल्ली की सड़कों पर निजी वाहनों की संख्‍या बढ़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण यहां प्रभावी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा न होना है। यह सही है कि अब कुछ मार्गों पर दिल्ली मेट्रो रेल सेवा शुरू की गई है। सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह है कि जिन इलाकों से मेट्रो गुजर रही है। वहां की सड़कों पर निजी वाहनों की संख्‍या कम हुई है। वैसे भी दिल्ली का एकमात्र ऐसा है जहां सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ढांचा मजबूत करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि यहां परिवहन आवागमन के लिए निजी वाहनों पर निर्भरता काफी बढ़ी है। दरअसल भट्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट को लेकर दिल्ली सरकार काफी अर्से से दुविधा का शिकार रही है। कभी यहां की सड़कों पर हाइकैपेसिटी सें दौड़ाने की बात की जाती हैं तो कभी इलेट्रिक ट्रॉली या फिर ट्राम बस दौड़ने की योजना बनाती है। योजना की घोषणा करने के बाद सरकार उस पर अमल करना भूल जाती है। जिसकी वजह से यहां की यातायात व परिवहन समस्या दिनों-दिन जटिल होती जा रही है।

लोकतंत्र के सशक्‍त स्तंभ न्यायपालिका को भ्रष्‍टाचार धीरे-धीरे खोखला करता जा रहा है। सरकार यह तो मानती है कि न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्‍टाचार की उसे रिपोर्ट मिल रही है। मगर वह भ्रष्‍ट न्यायपालिका की जांच के लिए कोई आयोग या समिति बनाने में अक्षम बता रही है। विधि एवं न्यायमंत्री हंसराज भारद्वाज के लोकसभा में दिए गए इस आशय के बयान से सरकार की लाचारी प्रकट होती है। ऐसा लगता है कि सरकार भ्रष्‍टाचार को सामाजिक मान्यता दिलाने का काम कर रही है।यह सही है कि भ्रष्‍टाचार की गहरी जड़ें हमारी व्यवस्था में घुस चुकी है। जिन्हें आसानी से काटना संभव नहीं है। मगर सरकार ही जब इस समस्या का समाधान खोजने के बजाय अपनी अक्षमता का बहाना बनाने लगेगी तो सवाल यह उठता है कि फिर ऐसी सरकार का काम ही क्‍या है?विधि एवं न्यायमंत्री हंसराज भारद्वाज के इस बयान से लगता है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के मुख्‍य न्यायाधीश के उस बयान के आगे झुक गई है, जिसमें यह कहा गया था कि अपनी संपत्ति का ब्‍यौरा देने से न्यायधीशों के आत्म-सम्‍मान को ठेस पहुंचेगी। उनका यह भी कहना था कि न्यायाधीशों के भ्रष्‍टाचार मामलों की जांच करने का अधिकार किसी ऐरे-गैरे व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। एक प्रकार से देखा जाए तो मुख्‍य न्यायाधीश ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्‍टाचार का बचाव करने के साथ ही इस मामले में अपनी मंशा जाहिर कर दी थी। गौरतलब है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों ही भ्रष्‍टाचार के मामलों को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं। जिसकी वजह से लोगों में इन दोनों के प्रति इज्जत कम हुई है। आम जनता यह मानने लगी है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों ही पूरी तरह से भ्रष्‍ट हो चुकी हैं। ऐसे में सरकार का यह कर्तव्य बनता था कि वह न्यायपालिका को भ्रष्टाचार से मुक्‍त करने के लिए ठोस कदम उठाती। जिससे न्यायपालिका की गरिमा व सम्‍मान की रक्षा की जा सकती। इसके विपरीत विधि एवं न्याय मंत्री ने अपनी लाचारी जता कर यह साबित कर दिया है कि भ्रष्‍टाचार रूपी हमाम में सब नंगे हैं। हालांकि अपनी सफाई में हंसराज भारद्वाज कह सकते हैं कि उनकी सरकार न्यायपालिका से किसी प्रकार टकराव मोल नहीं लेना चाहती। इसलिए वह भ्रष्‍ट न्यायपालिका की जांच के लिए किसी प्रकार का आयोग या समिति गठित करने का कोई इरादा नहीं रखती है। मगर उनकी इस सफाई से भी यही संदेश जाएगा कि भ्रष्‍टाचार के मामले में सरकार न्यायपालिका के साथ एक प्रकार की सौदेबाजी करना चाहती है। जिसके तहत वह न्यायपालिका के भ्रष्‍टाचार पर पर्दा डालने की एवज में यह चाहती है कि न्यायपालिका भी जन प्रतिनिधियों से संबंधित भ्रष्‍टाचार के मामलों को लेकर ज्यादा तूल न दें। उल्लेखनीय है कि संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के अनेक मंत्री दागी हैं। हंसराज भारद्वाज के इस तरह के बयान से ऐसा लगता है कि सरकार देर-सबेर नगर निगम से लेकर हर तरह के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी मान्यता दे देगी। इससे आम नागरिकों में तो बेचैनी फैल जाएगी मगर भ्रष्टाचारियों के हौंसले बुलंद हो जाएंगे। वैसे भी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार हाथ खड़े करती आ रही है। उससे तो बेहतर यह होगा कि सरकार भ्रष्‍टाचार को कानूनी जामा पहना दे और भ्रष्ट तरीके से अवैध कमाई करने वालों को कर के दायरे में ले आए। इससे सरकारी राजस्व भी बढ़ेगा और सरकार भ्रष्टाचारियों पर नजर रखने के लिए कामकाज जुटाने के झंझट से भी बच जाएगी। ऐसी स्थिति में उसे भ्रष्टाचार निरोधक शाखा और ऐसे ही अन्य विभागों का खर्चा भी वहन नहीं करना पड़ेगा। इतना ही नहीं इससे सरकार भी भ्रष्‍टाचार के मामलों पर अंकुश लगा पाने में अपनी असमर्थता जताने की शर्मिंदगी से भी बच जाएगी और लोग भी ऐसे मामलों को लेकर ज्यादा व्‍यथित नहीं होंगे। यदि हमें अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली को बचाना है तो इसके सभी प्रमुख स्तंभों को भ्रष्टाचार रूपी दीमक से बचाने के प्रयास करने होंगे। वैसे भी अगर न्यायपालिका भ्रष्ट हो जाएगी तो लोगों को न्याय मिलने की बची-खुची सभी उम्‍मीदें भी खत्म हो जाएंगी।

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